छत्तीसगढ़ के साहित्यिक सितारे पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे पंचतत्व में विलीन, अंतिम विदाई में जुटे कला और राजनीति जगत के चेहरे

रायपुर। छत्तीसगढ़ ही नहीं, देश-विदेश में अपनी व्यंग्यात्मक शैली से लोगों के दिलों पर राज करने वाले पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे आज पंचतत्व में विलीन हो गए। रायपुर के मरवाही श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया। इस दौरान प्रदेश के राजनीतिक और साहित्यिक जगत की कई प्रमुख हस्तियों ने उन्हें नम आंखों से अंतिम विदाई दी।

भाजपा प्रदेश संगठन महामंत्री पवन साय, राज्य मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य, पूर्व सांसद अभिषेक सिंह, चर्चित कवि डॉ. कुमार विश्वास, सूफी भजन गायक पद्मश्री मदन चौहान, कवि सुदीप भोला और गायक-अभिनेता सुनील तिवारी सहित कई साहित्यप्रेमी और प्रशंसक मौजूद रहे।

डॉ. सुरेंद्र दुबे को हाल ही में तबीयत बिगड़ने के बाद रायपुर के एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट में भर्ती कराया गया था, जहां इलाज के दौरान उन्हें हार्ट अटैक आया और 71 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली।

हास्य को बनाया सामाजिक चेतना का माध्यम

8 अगस्त 1953 को बेमेतरा (छत्तीसगढ़) में जन्मे डॉ. दुबे पेशे से आयुर्वेदिक चिकित्सक थे, लेकिन उन्होंने खुद को एक साहित्यिक योद्धा के रूप में स्थापित किया। हास्य और व्यंग्य की विधाओं को उन्होंने सिर्फ हँसी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक संदेश, राजनीतिक आलोचना और मानवीय संवेदना का माध्यम बनाया। उनकी मंचीय प्रस्तुतियों में व्यंग्य की धार और शब्दों की मार्मिकता लोगों को हँसाते-हँसाते सोचने पर मजबूर करती थी।

साहित्यिक सफर और गौरवपूर्ण उपलब्धियाँ

डॉ. सुरेंद्र दुबे ने पांच पुस्तकें लिखीं और देशभर के मंचों व टीवी कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उनकी साहित्यिक प्रतिभा को मान्यता देते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2010 में पद्मश्री से सम्मानित किया।

इससे पहले वे काका हाथरसी हास्य रत्न पुरस्कार (2008), पं. सुंदरलाल शर्मा सम्मान (2012), अट्टहास सम्मान, और लीडिंग पोएट ऑफ इंडिया जैसे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके थे। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उन्होंने छत्तीसगढ़ और हिन्दी साहित्य को गौरवान्वित किया। अमेरिका के वाशिंगटन में हास्य शिरोमणि सम्मान (2019) और शिकागो में छत्तीसगढ़ रत्न सम्मान से नवाजे गए।

पीएचडी विषय बने, तीन विश्वविद्यालयों ने दी मान्यता

डॉ. दुबे की रचनात्मकता और प्रभावशीलता इतनी प्रखर रही कि उनकी रचनाओं पर देश के तीन विश्वविद्यालयों ने शोध कर विद्यार्थियों को पीएचडी की उपाधि प्रदान की। यह उनके साहित्यिक योगदान की गंभीरता और स्थायित्व का प्रमाण है।

एक युग का अंत

छत्तीसगढ़ की माटी से जन्मे और दुनिया भर में हँसी के माध्यम से संदेश पहुंचाने वाले डॉ. सुरेंद्र दुबे की कमी न सिर्फ साहित्यिक जगत को, बल्कि पूरे समाज को लंबे समय तक खलेगी। उनकी विदाई केवल एक कवि की नहीं, बल्कि एक युग की विदाई है।

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