0 प्रभारी’ सीएमओ ने दिखाया दुस्साहस
0 मामला नगर पंचायत गीदम में मनमानी का
जगदलपुर। बस्तर के लोगों की रक्षा के लिए अपने सीने पर हंसते-हंसते गोलियां झेलने वाले और अपने प्राणों की आहुति देने वाले ‘बस्तर टाइगर’ महेंद्र कर्मा की शहादत आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। एक आदिवासी लौह पुरुष, जो जन-जन के प्रेरणास्रोत रहे हैं, उनके सम्मान में प्रदेश के मुख्यमंत्री ने गीदम नगर में नेशनल हाईवे के किनारे बने व्यवसायिक परिसर का नामकरण ‘शहीद महेंद्र कर्मा पालिका बाजार’ करने की घोषणा की थी। लाखों की लागत से यह डबल स्टोरी बिल्डिंग बनकर तैयार हो गई, व्यावसायिक दुकानों की नीलामी भी पूरी हो गई, लेकिन जब बोर्ड लगने की बारी आई, तो वहां से शहीद महेंद्र कर्मा का नाम ही गायब कर दिया गया।
बोर्ड पर केवल “पालिका बाजार” लिखा होना हर उस राहगीर और आम नागरिक को अचंभित कर रहा है, जो यह जानता है कि इसके लिए मुख्यमंत्री स्तर से क्या घोषणा हुई थी। आखिर नगर पंचायत गीदम का प्रशासनिक अधिकारी मुख्यमंत्री की घोषणा को कितनी तवज्जो दे रहा है, यह इस बोर्ड से साफ दिखाई देता है।
यह लिपिक से ‘प्रभारी’ सीएमओ बने अधिकारी के अहंकार को दर्शाता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक प्रभारी सीएमओ जिसका मूल पद महज लिपिक (ग्रेड-2) का है, उसे इतना दुस्साहस कहां से मिला? ये अधिकारी शेर की खाल ओढ़कर यह भूल गए कि वह वास्तव में क्या हैं? पूर्व परिषद के निर्णय और दुकानों की नीलामी प्रक्रिया में भी शहीद महेंद्र कर्मा के नाम का प्रस्ताव बाकायदा पारित किया गया था। मगर वर्तमान में उन तमाम घोषणाओं और परिषद के प्रस्तावों को दरकिनार करते हुए, इस जवाबदार अधिकारी ने जो तानाशाही दिखाई है, वह बर्दाश्त के बाहर है। ये अधिकारी शायद यह भूल गए हैं कि शेर की खाल ओढ़ लेने से कोई शेर नहीं बन जाता। प्रशासन और जनता जब चाहे, इस अहंकार की खाल को उधेड़कर असलियत सामने ला सकती है। एक शहीद के सम्मान के साथ नगरीय प्रशासन का यह क्रूर मजाक किसी भी वक्त भयंकर जन-आक्रोश का रूप ले सकता है। हजारों आदिवासियों और स्थानीय लोगों की आस्था पर जो ठेस इस सीएमओ ने पहुंचाई है, उसकी कीमत प्रशासन को भारी पड़ सकती है।
जिला कांग्रेस अध्यक्ष चुप क्यों?
इस पूरे घटनाक्रम में एक और पहलू उतना ही हैरान करने वाला है। जिस नवनिर्मित पालिका बाजार से शहीद कर्मा का नाम हटाया गया है, ठीक उसी से लगा हुआ जिला कांग्रेस अध्यक्ष का निवास है। अपनी ही पार्टी के इतने बड़े आदिवासी नेता और शहादत के प्रतीक का नाम हटा दिए जाने पर उनकी ओर से कोई आवाज न उठना, पूरे जनमानस में चर्चा का विषय बना हुआ है। आखिर इसे “दीया तले अंधेरा” न कहें तो क्या कहें? यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।
प्रशासन कसे शिकंजा, करे कार्रवाई
शहीद किसी एक पार्टी या व्यक्ति के नहीं, पूरे देश और समाज के होते हैं। उनके सम्मान के साथ खिलवाड़ करना सीधे तौर पर जनता की भावनाओं से खेलना है। जिला प्रशासन को अब मूकदर्शक बनकर नहीं रहना चाहिए। जिस अधिकारी ने मुख्यमंत्री की भावनाओं और उनकी सार्वजनिक घोषणा के विपरीत जाकर अपनी मनमानी की, जिसने न तो शहीद के सम्मान की परवाह की और न ही सरकारी आदेशों को गंभीरता से लिया, उस पर तत्काल कड़ी से कड़ी दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसे लापरवाह और बेलगाम अधिकारियों पर प्रशासन को निश्चित रूप से शिकंजा कसना होगा, ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी किसी शहीद के नाम, मान, सम्मान और मुख्यमंत्री के आदेशों का इस तरह सरेआम मखौल उड़ाने की हिम्मत न कर सके।