0 यह संशोधन छत्तीसगढ़ के आर्थिक हितों पर सीधे कुठाराघात है, प्रदेश को भारी राजस्व क्षति होगी
रायपुर। लोकसभा और राज्यसभा में बिना चर्चा के जबरिया पारित ‘‘मिनरल संशोधन अध्यादेश 2026’’ को छत्तीसगढ़ के आर्थिक हितों के खिलाफ लिया गया अधिनायकवादी फैसला बताते हुए प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मुख्य प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि चंद कॉर्पाेरेट की गुलाम केंद्र की मोदी सरकार ने अपने पूंजीपति मित्रों के मुनाफ़े के लिए बिना किसी चर्चा के एक और कानून संसद में पारित करवा लिया है, जो राज्यों द्वारा खनिज अधिकारों पर कर या उपकर (Cess) लगाने पर रोक लगाता है, और केंद्र सरकार को खनिज-युक्त भूमि पर पूरे नियंत्रण का अधिकार देता है। अब तक MMDR Act 1957 प्रमुख खनिजों (केंद्र द्वारा नियंत्रित) और गौर खनिजों (राज्य सरकारों द्वारा नियंत्रित) के बीच अंतर स्पष्ट करता रहा था। ताज़ा संशोधन का उद्देश्य राज्यों के कर पर रोक लगाना है। छत्तीसगढ़ जैसे खनिज संसाधनों वाले राज्य सरकारें अब केंद्र की तय सीमाओं के बिना खनिज अधिकारों या खनिज वाली भूमि पर अतिरिक्त कर या लेवी नहीं लगा सकेंगी। मोदी सरकार का कुतर्क है कि ‘‘खनन उद्योग पर आर्थिक बोझ कम करने और पूरे देश में करों में एकरूपता लाने के लिए यह बदलाव किया गया है।’’ यह सीधे तौर पर राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण है, संघीय ढांचे के खिलाफ है, राज्यों के अधिकारों को सीमित करने वाला है। चढ़ावा चोरी, जंतर मंतर और बिहार में छात्रों के साथ हुए दमन और बर्बरता के विरोध के चलते बाधित संसद सत्र में पहले लोकसभा में इसे जबरिया पास कराया, और फिर राज्य सभा में भी। मोदी-शाह अति स्वामीभक्ति और सेठ के चाकरी में लगातार ऐसे जनविरोधी फैसले ले रही है, पहले वन अधिकार अधिनियम और कोल बेयरिंग एक्ट में संशोधन फिर दर्जनों श्रम कानूनों में श्रमिकों के हितों को खत्म किया गया अब राज्यों के आर्थिक हितों पर कुठाराघात।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मुख्य प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि भाजपा सरकार पहले भी पांचवी अनुसूची के क्षेत्रों में पेसा कानून के तहत प्राप्त अधिकारों को छीनने का काम कर ही रही है, नंदराज पर्वत से लेकर हसदेव, तमनार, धमजयगढ़, रायगढ़, मैनपाट, बैलाडीला, बचेली, किरंदुल, कांकेर और बीजापुर में ग्रामसभा की सैकड़ों आपत्ति को दरकिनार करके निजी खनन कंपनियों को लाभ पहुंचाया गया, इसी क्रम में अब एक और षडयंत्र को अंजाम दिया गया है। खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 जिसे सामान्यतः मिनरल संशोधन बिल कहा जा रहा है इस पर कांग्रेस को कड़ी आपत्ति है। यह कानून राज्यों के कर लगाने के संवैधानिक अधिकारों को छीनता है, संघीय ढांचे (फेडरलिज्म) को कमजोर करता है और यह बिल बिना किसी सार्थक चर्चा के जल्दबाजी में पारित किया गया है। संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों पर केंद्र का यह अव्यावहारिक फैसला, प्रत्यक्ष हमला है इससे छत्तीसगढ़, केरल और झारखंड जैसे खनिज उत्पादक राज्यों को बड़ा नुकसान है।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मुख्य प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची के तहत ‘‘भूमि’’ राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आती है। वर्ष 2024 के सुप्रीम कोर्ट के नौ-न्यायाधीशों की बेंच के फैसले के विपरीत, यह केंद्र सरकार को खनिज-युक्त भूमि पर टैक्स और सेस तय करने की असीमित शक्ति देता है। यह संशोधन 2024 के सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए लाया गया है, जिसमें राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की अनुमति दी गई थी। इसके तहत राज्यों द्वारा पहले से लगाए गए लेकिन वसूल न किए गए करों को अवैध घोषित किया गया है, जो सीधे तौर पर छत्तीसगढ़ की वित्तीय स्वायत्तता पर आघात है। केंद्र के इस कदम से खनिज समृद्ध छत्तीसगढ़ के राजस्व में भारी कमी आएगी। खनन गतिविधियों से होने वाले स्थानीय पर्यावरण और बुनियादी ढांचे के नुकसान की भरपाई के लिए कर जरूरी हैं, जिन पर अब रोक लग जाएगी। लोकसभा और राज्यसभा में यह विधेयक भारी हंगामे और विरोध के बीच बिना किसी व्यापक चर्चा के पारित कर दिया गया। कांग्रेस ने मांग की थी कि इस संवेदनशील विधेयक को तुरंत समीक्षा के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा जाना चाहिए, जिसे मोदी सरकार ने नजरअंदाज कर दिया।