
० पूरी तरह बदल गई गांव की तस्वीर और तकदीर
० सुशासन तिहार के में जमीन पर बैठ कर अफसरों ने सुनी समस्याएं
जगदलपुर/कोंटा। जहां कभी नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती थी, नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में कुख्यात उस गोमपाड़ का इतिहास अब तेजी से बदल रहा है। लाल आतंक के साये में सरकारी योजनाएं जहां दम तोड़ देती थीं, उसी धरती पर छत्तीसगढ़ सरकार का ‘सुशासन तिहार’ उम्मीद और विश्वास के साथ आयोजित हुआ। नक्सल उन्मूलन की घोषणा के बाद पहली बार जिला प्रशासन का अमला जब गोमपाड़ पहुंचा तो ग्रामीणों की आंखों में अविश्वास की जगह उम्मीद की चमक साफ दिखाई दे रही थी। प्रशासनिक अधिकारियों ने गांव की चौपाल में ग्रामीणों के बीच बैठकर उनके साथ आत्मीय संवाद किया। इस दौरान दशकों से विकास की बाट जोह रहे ग्रामीणों ने खुलकर अपनी मांगें प्रशासन के समक्ष रखीं।
प्रशासनिक अमले में शामिल अधिकारी ने ग्रामीणों को संबोधित करते हुए कहा कि गोमपाड़ अब नक्सलियों का नहीं, संविधान को मानने वालों का गांव है। इस गांव का दर्द वैसे तो दशकों पुराना है, पर अब समाधान महीनों में दिखेगा। उन्होंने मौके पर ही स्वास्थ्य विभाग को हर 15 दिन में हेल्थ कैंप लगाने, शिक्षा विभाग को शिक्षकों की व्यवस्था करने और पंचायत विभाग के अधिकारियों को तालाब गहरीकरण का प्रस्ताव जल्द तैयार करने के निर्देश दिए। भरोसा दिलाया कि मोबाईल टॉवर के लिए सुरक्षा और तकनीकी सर्वे इसी सप्ताह शुरू होगा। प्रशासनिक अधिकारियों को अपने बीच पाकर गांव के एक बुजुर्ग ने कहा कि हमने कभी सोचा भी नहीं था कि प्रशासन हमारे गांव की माटी पर हमारे बीच बैठकर हमारी समस्याओं को सुनेगा। पहले यहां बंदूक बोलती थी, आज सरकार बोल रही है। यही असली आजादी है। नक्सलवाद की काली छाया से निकलकर सुशासन के उजाले की ओर बड़ रहा है गोमपाड़।
भावुक हुए पी. विजय
सुशासन तिहार के ऐतिहासिक अवसर पर कोंटा क्षेत्र के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं नक्सल विरोधी अभियान के नेता पी. विजय पहली बार नक्सल मुक्त गोमपाड़ पहुंचे। दशकों तक नक्सल हिंसा का दंश झेल चुके बस्तर में शांति और नक्सल विरोध की अलख जगाने वाले पी. विजय की आंखें गांव की बदली हुई तस्वीर देखकर नम हो गईं। उन्होंने कहा कि आज गोमपाड़ की माटी को नमन करते हुए मेरा सिर गर्व से ऊंचा हो गया है। मैंने अपने जीवन के 25 वर्ष इस लाल आतंक के विरुद्ध लड़ते-लड़ते गुजार दिए। कभी इसी गोमपाड़ का नाम सुनते ही रूह कांप उठती थी। कभी यह गांव व नक्सलियों की ‘लिबरेटेड जोन’ और समानांतर सरकार का प्रतीक माना जाता था। यहां भारत का संविधान नहीं, बंदूक का कानून चलता था। पर आज यहां तिरंगा लहरा रहा है, प्रशासनिक अधिकारी जमीन पर बैठकर माता-बहनों की बात सुन रहे हैं, और बच्चे ‘भारत माता की जय’ बोल रहे हैं। इससे बड़ा चमत्कार लोकतंत्र के लिए और क्या हो सकता है। मैं उन वीर जवानों को शत-शत नमन करता हूं, जिन्होंने अपना रक्त देकर इस धरती को भयमुक्त किया। उन शहीद परिवारों को प्रणाम करता हूं, जिनके अपनों की कुर्बानी से आज गोमपाड़ में सुशासन का सूरज उगा है, पर यह शुरुआत मात्र है, मंजिल नहीं। इस अवसर पर उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि गोमपाड़ को विशेष अपेक्षित गांव के तौर पर लेते हुए यहां मूलभूत सुविधाओं का विस्तार करें। शासन की योजनाओं को गांव के हर व्यक्ति तक पहुंचाएं। यहां विकास की ऐसी इबारत लिखें कि हमारा गोमपाड़ आदर्श नक्सलमुक्त ग्राम बन सके। ग्रामीणों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि डरने का समय अब चला गया अब गढ़ने का समय आया है। सरकार आपके द्वार पर है, पर विकास की मशाल आपके हाथ में है। शिक्षा को अपना हथियार बनाओ, संविधान को अपना कवच बनाओ। फिर देखना, कोई भी ताकत गोमपाड़ को दोबारा अंधेरे में नहीं धकेल सकेगी।