0 सुकमा के नक्सलमुक्त होने पर स्कूल भवन को किया दंडवत प्रणाम
0 एक शिक्षक की नक्सल विरोधी यात्रा की गूंज
(अर्जुन झा) जगदलपुर। नक्सली भले ही बस्तर के भोले भाले लोगों को अपने भ्रमजाल में फंसाने में कामयाब हो गए थे, मगर पढ़े लिखे लोग उनकी मंशा को भांप चुके थे। इन्हीं लोगों में शामिल हैं शिक्षक पी. विजय नायडू, जो लगातार 30 साल तक नक्सलवाद का विरोध करते रहे। इसी वजह से उन्हें नक्सलियों की गोलियों का शिकार बनना पड़ा था, फिर भी उनका जज्बा बरकरार रहा। सुकमा जिले के नक्सलमुक्त होते ही श्री नायडू अपनी कर्मस्थली शाला में पहुंचे और शाला के दरवाजे पर दंडवत हो गए।
1996 दशक में नूलकातोंग की प्राथमिक शाला में बच्चों को पढ़ाकर शिक्षकीय जीवन शुरू करने वाले पी. विजय नायडू आज तीस वर्षों के बाद उसी स्कूल के आंगन में दंडवत हुए, इमारत को देवालय मानकर। बीच के कुछ साल इनके आसान नहीं थे। गांव में बढ़ते नक्सलवाद को करीब से देखने के बाद उन्होंने पढ़ाना छोड़ा और खुलकर नक्सलियों के विरोध का रास्ता चुना। नतीजतन वे नक्सलियों की हिट लिस्ट में शुमार हो गए और कोंटा के हृदय स्थल पर उन्हें सरे बाजार नक्सलियों द्वारा गोली मार दी गई। शरीर खून से लथपथ हो गया, लेकिन इच्छाशक्ति टूटी नहीं। अस्पताल से लौटकर उन्होंने 25 साल तक जोखिम भरा जीवन गुजारा। जब कोंटा ब्लॉक की इस पट्टी में हिंसा और खौफ का बोलबाला था। नूलकातोंग और पड़ोसी गोमपाड़ वही गांव हैं, जहां सन 2009 में 8 नक्सलियों और नूलकातोंग में 2016 में 16 नक्सलियों को सुरक्षा बलों ने ढेर किया था। आप सोच सकते हैं कि उस दौर में नक्सलियों का लाल आतंक किस कदर था।आज नक्सली प्रभाव के सिमटने से बदली हवाओं के बीच श्री नायडू फिर नूलकातोंग पहुंचे। स्कूल प्रांगण में कुछ पल ख़ामोश खड़े रहे, फिर माथा टेक दिया , न भाषण, न नारेबाजी, आसपास के ग्रामीण, युवा मौन गवाह बने देखते रहे। उनके लिए यह वापसी इच्छाशक्ति पूर्णता से इसलिए ज्यादा बड़ी थी, कि जिस गांव में कभी बंदूक की हुकूमत देखी, वहीं अब स्कूल की घंटी और रोज़मर्रा की बोली सुनना नसीब हुआ। उनका शिक्षक से नक्सल विरोधी नागरिक, फिर जीवित गवाह तक का सफर यह बताता है कि धीरज जब टिके रहे, तो डर स्थायी नहीं होता। नूलकातोंग की धूल में छपा वह दंडवत चिन्ह एक आदमी का नहीं, पूरे अंचल की हिम्मत का चिन्ह बन गया है। दंडवत होने के बाद श्री नायडू ने स्कूल के आंगन के हैंडपंप से पानी खींचा, दो घूंट में प्यास और तीस साल का फासला बुझा दिया। पी. विजय नायडू का लाल आतंक की अति से लेकर अंत भी देखने की यह कहानी दिलचस्प ही नहीं, बस्तरवासियों के लिए बड़ी प्रेरणा भी है कि अब किसी बहकावे में नहीं आना है, किसी भ्रमजाल में नहीं फंसना है।