
इन दिनों पूरे देश में भगवान महाप्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा की भव्य तस्वीरें आस्था, उत्साह और सांस्कृतिक एकता का संदेश दे रही हैं। लाखों श्रद्धालुओं की सहभागिता के बीच यह महापर्व भारतीय सभ्यता की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है, जो विविधताओं को एक सूत्र में पिरोती है। इसी राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना के बीच छत्तीसगढ़ के बस्तर से भी एक ऐसी तस्वीर उभरती है, जो अपनी विशिष्ट परंपरा, जनसहभागिता और सांस्कृतिक वैभव के कारण पूरे देश का ध्यान आकर्षित करती है।
जगदलपुर में गोंचा महापर्व की एक झलक।
वन, वन्यजीवों और खनिज संपदा से समृद्ध बस्तर की सांस्कृतिक आत्मा का एक अद्वितीय स्वरूप है गोंचा महापर्व। लगभग छह शताब्दियों से मनाया जा रहा यह पर्व भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा, तुपकियों की पारंपरिक सलामी, लोकवाद्यों की गूंज और हजारों श्रद्धालुओं की सहभागिता के साथ जनआस्था, लोकपरंपरा और सामाजिक समरसता का जीवंत उत्सव है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जनजातीय सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक एकता और सामुदायिक सहभागिता का सशक्त प्रतीक है। बदलते बस्तर में गोंचा महापर्व इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक विकास और सांस्कृतिक विरासत एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं। कभी बस्तर का नाम आते ही लोगों के मन में घने जंगल, जनजातीय जीवन और नक्सल हिंसा की छवि उभरती थी। लंबे समय तक यह क्षेत्र सुरक्षा और विकास की चुनौतियों के कारण चर्चा में रहा। किंतु आज बस्तर एक नई पहचान गढ़ रहा है। यह परिवर्तन केवल सड़कों, भवनों और योजनाओं का नहीं, बल्कि विश्वास, जनसहभागिता, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और युवा शक्ति के जागरण का परिवर्तन है। बस्तर आज यह संदेश दे रहा है कि जब विकास स्थानीय संस्कृति, जनविश्वास और सुशासन के साथ आगे बढ़ता है, तब सबसे कठिन चुनौतियां भी नई संभावनाओं में बदल जाती हैं। इस परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति बस्तर का युवा है। आज का युवा केवल रोजगार का इंतजार नहीं कर रहा, बल्कि खेल, शिक्षा, कौशल, उद्यमिता और नवाचार के माध्यम से अपना भविष्य स्वयं गढ़ रहा है। इसका सबसे प्रभावी उदाहरण बस्तर ओलंपिक है। वर्ष 2025 में आयोजित इसके दूसरे संस्करण में 3.91 लाख खिलाड़ियों ने भाग लिया, जो पहले संस्करण की तुलना में लगभग ढाई गुना अधिक है। खिलाड़ियों की बढ़ती भागीदारी में महिलाओं की वृद्धि दर पुरुषों से अधिक रही, जो जनजातीय समाज में बढ़ते आत्मविश्वास और सामाजिक परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है।
खेल बनाम सामाजिक पुनर्वास
छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले का कोलेंग और चांदामेटा दरभा ब्लॉक के अति दुर्गम इलाके हैं। यहां प्रातः काल से बच्चे व्यायाम और खेलकूद कार्य दिखाई देते हुए। बस्तर ओलंपिक की सबसे प्रेरक उपलब्धियों में से एक यह रही कि 700 से अधिक ऐसे युवाओं, जिन्होंने नक्सलवाद का मार्ग छोड़कर आत्मसमर्पण किया था, ने भी इस आयोजन में भाग लिया। यह केवल खेल प्रतियोगिता में सहभागिता नहीं थी, बल्कि हिंसा से विकास, भय से विश्वास और अलगाव से मुख्यधारा की ओर लौटते बस्तर की सशक्त अभिव्यक्ति थी। खेल यहां सामाजिक पुनर्वास, आत्मविश्वास और नई शुरुआत का माध्यम बनकर उभरे हैं। बस्तर ओलंपिक की सफलता के बाद आयोजित सरगुजा ओलंपिक ने इस जनआंदोलन को पूरे प्रदेश तक पहुंचाया। इसी सकारात्मक परिवर्तन की निरंतरता में वर्ष 2026 में छत्तीसगढ़ को खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स की मेजबानी का अवसर प्राप्त हुआ। यह केवल एक राष्ट्रीय खेल आयोजन नहीं, बल्कि उन जनजातीय क्षेत्रों के बदलते स्वरूप का राष्ट्रीय सम्मान है, जिन्हें कभी केवल संघर्ष और चुनौतियों के संदर्भ में देखा जाता था। आगामी राष्ट्रमंडल खेलों और ओलंपिक जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों के लिए भी जनजातीय खिलाड़ियों को तैयार करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि बस्तर की प्रतिभाएँ भारत का गौरव बढ़ा सकें।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण भी
खेलों के साथ-साथ सांस्कृतिक पुनर्जागरण ने भी बदलते बस्तर को नई पहचान दी है। बस्तर पंडुम इसका सशक्त उदाहरण है। वर्ष 2026 में आयोजित इस महोत्सव में 55 हजार से अधिक जनजातीय कलाकारों और प्रतिभागियों ने लोकनृत्य, लोकगीत, पारंपरिक वाद्ययंत्र, हस्तशिल्प, लोककथाओं और जनजातीय जीवन शैली का जीवंत प्रदर्शन किया। यह आयोजन केवल सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय अस्मिता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक संरक्षण का राष्ट्रीय मंच बनकर उभरा। इससे नई पीढ़ी में अपनी परंपराओं के प्रति गर्व की भावना सुदृढ़ हुई और स्थानीय कलाकारों को व्यापक पहचान मिली।
डॉ. बुधरी ताती का योगदान
बदलते बस्तर की प्रेरक कहानियों में पद्मश्री डॉ. बुधरी ताती का योगदान विशेष उल्लेखनीय है। उन्होंने चार दशकों से अधिक समय तक दक्षिण बस्तर के दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों में बालिका शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक जागरूकता के लिए कार्य किया। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनका समर्पण यह सिद्ध करता है कि शिक्षा किसी भी समाज में स्थायी परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम है। उनका जीवन आज भी हजारों जनजातीय बेटियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। बस्तर के परिवर्तन की एक अभिनव पहल वीर शहीद गुंडाधुर सेवा डेरा है। प्रथम चरण में लगभग 70 सेवा डेरों का विकास किया जा रहा है, जिन्हें भविष्य में लगभग 200 जनसेवा केंद्रों के रूप में विकसित करने की योजना है। इन सेवा डेरों के माध्यम से नागरिकों को बैंकिंग, आधार, डिजिटल सेवाएँ तथा केंद्र एवं राज्य सरकार की 371 से अधिक योजनाओं का लाभ एक ही स्थान पर उपलब्ध कराया जा रहा है। यह पहल स्पष्ट करती है कि सुरक्षा और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं तथा विश्वास का वातावरण ही स्थायी विकास का आधार बनता है।
आधारभूत संरचना
आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी बस्तर ने उल्लेखनीय प्रगति की है। वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में ₹20,557 करोड़ की लागत से 12,211 किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण किया गया है। इन सड़कों ने दूरस्थ गांवों को शिक्षा, स्वास्थ्य, बाजार और प्रशासन से जोड़ा है। डिजिटल संपर्क को सुदृढ़ करने के लिए 13,000 मोबाइल टॉवरों की योजना के अंतर्गत लगभग 5,000 टॉवर स्थापित किए जा चुके हैं, जिससे इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं उन क्षेत्रों तक पहुंची हैं जहां कभी संचार सबसे बड़ी चुनौती था।शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में भी परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है। 259 एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय, 46 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान तथा 49 कौशल विकास केंद्र जनजातीय युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण उपलब्ध करा रहे हैं। 90 हजार से अधिक युवाओं और महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार और रोजगार के नए अवसर विकसित किए गए हैं। इसके साथ ही 1,804 बैंक शाखाएं, 1,321 एटीएम तथा 890 डाकघरों का विस्तार वित्तीय समावेशन को नई मजबूती प्रदान कर रहा है।
बस्तर की अर्थव्यवस्था
बस्तर की अर्थव्यवस्था सदियों से जल, जंगल और जमीन पर आधारित रही है। आज लघु वनोपज के मूल्य संवर्धन, वन आधारित उद्योगों, महिला स्व-सहायता समूहों, सहकारिता मॉडल, दुग्ध सहकारी समितियों तथा स्थानीय उद्यमिता को प्रोत्साहन देकर जनजातीय परिवारों की आय बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इससे विकास का लाभ सीधे स्थानीय समुदायों तक पहुंच रहा है और आत्मनिर्भर बस्तर की मजबूत नींव तैयार हो रही है। पर्यटन भी बदलते बस्तर की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरा है। चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, धोलकल, विश्वविख्यात बस्तर दशहरा, गोंचा महापर्व और समृद्ध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर रही है। पर्यटन के विस्तार से स्थानीय हस्तशिल्प, धातु शिल्प, बांस कला, लघु वनोपज, पारंपरिक व्यंजन और ग्रामीण उद्यमिता को नई गति मिली है। इससे स्थानीय युवाओं और महिलाओं के लिए सम्मानजनक आजीविका के नए अवसर भी विकसित हुए हैं।
सबसे बड़ी उपलब्धि
बदलते बस्तर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि आज विकास केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जनसहभागिता का व्यापक अभियान बन चुका है। गांवों में बढ़ती सामाजिक भागीदारी, युवाओं का आत्मविश्वास, महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण और सांस्कृतिक गौरव की पुनर्स्थापना इस परिवर्तन की वास्तविक पहचान बन चुके हैं। यही कारण है कि आज बस्तर भय और हिंसा की नहीं, बल्कि विश्वास, अवसर और विकास की नई कहानी लिख रहा है। आने वाले वर्षों के लिए बस्तर के विकास का लक्ष्य और भी व्यापक है। इसे देश के अग्रणी जनजातीय क्षेत्रों में विकसित करने, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल, पर्यटन, कौशल विकास और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति देने के लिए अनेक पहलें जारी हैं। खेल, संस्कृति और सुशासन का यह समन्वित मॉडल केवल बस्तर के लिए ही नहीं, बल्कि देश के अन्य जनजातीय क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकता है।
आज जब भगवान महाप्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा पूरे देश को आस्था, समरसता और सांस्कृतिक एकता का संदेश दे रही है, उसी समय बस्तर का गोंचा महापर्व यह संदेश देता है कि संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य के विकास की आधारशिला भी है। गोंचा महापर्व से लेकर बस्तर ओलंपिक, सरगुजा ओलंपिक, खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स, बस्तर पंडुम, पद्मश्री डॉ. बुधरी ताती जैसी प्रेरक विभूतियां तथा वीर शहीद गुंडाधुर सेवा डेरा जैसी अभिनव पहलें यह दर्शाती हैं कि जब संघ और राज्य की डबल इंजन की सरकार की दृढ़ निश्चय व संवेदनशीलता, समाज की सहभागिता और स्थानीय संस्कृति एक साथ आगे बढ़ती हैं, तब परिवर्तन स्थायी और व्यापक बनता है। बस्तर में यह बदलाव यात्रा आज केवल छत्तीसगढ़ की सफलता की गाथा नहीं, बल्कि विकसित भारत की उस परिवर्तनकारी यात्रा का प्रतिबिंब है, जिसमें जनजातीय अस्मिता, सांस्कृतिक विरासत, सुशासन, सामाजिक समरसता और आधुनिक विकास एक-दूसरे के पूरक बनकर आगे बढ़ते हैं। गोंचा से जन सहभागिता तक की यह यात्रा वास्तव में जनजातीय विकास की एक प्रेरक गाथा है, जो पूरे देश के लिए समावेशी विकास का एक प्रभावी मॉडल प्रस्तुत करती है।
लेखक: आशीष सीताशरण सोनी