

0 तुंगल इको-पर्यटन केंद्र बना पुनर्वास, रोजगार और सम्मान की नई पहचान
0 तुंगल नेचर कैफे से बदली 10 नक्सल प्रभावित महिलाओं की तकदीर
0 तुंगल डेम की खूबसूरती से खिंचे चले आए 10 हजार से ज्यादा सैलानी
(अर्जुन झा) जगदलपुर। नक्सलमुक्त बस्तर से अब ऎसी ऎसी तस्वीरें और खबरें सामने आ रही हैं, जो दिल को सुकून देती हैं। बदलते बस्तर की ये तस्वीरें और खबरें बताती हैं कि अब बस्तर राज्य के किसी भी संभाग से तरक्की के मामले में पीछे नहीं रहेगा और देश का सबसे समृद्ध एवं प्रगतिशील आदिवासी संभाग बनकर उभरेगा।ऎसी ही एक बेमिसाल तस्वीर आई है बस्तर संभाग के सुकमा जिले से, जहां नक्सल आतंक के बीच अपनी पहचान खो चुका एक बांध अब फिर से जीवित हो उठा है। यही नहीं, यह बांध अब पुनर्वास और आत्मनिर्भरता की पहचान भी बन गया है।
सुकमा का तुंगल, जो कभी उपेक्षा और वीरानी का प्रतीक था, आज उम्मीद, पुनर्वास और आत्मनिर्भरता की नई पहचान बन चुका है। सुकमा नगर से मात्र एक किलोमीटर दूर स्थित यह स्थल कभी जर्जर हालत में अपनी पहचान खो चुका था, लेकिन जिला प्रशासन और वन विभाग की पहल ने इसकी तस्वीर बदल दी है। प्राकृतिक सौंदर्य से सजे इस इको-पर्यटन केंद्र को नए स्वरूप में विकसित किया गया, जहां अब बड़ी संख्या में पर्यटक प्रकृति की गोद में सुकून के पल बिताने पहुंच रहे हैं। ओडिशा के मलकानगिरी तक से पर्यटकों का यहां आना इसकी बढ़ती लोकप्रियता का प्रमाण है। तुंगल डैम में शुरू की गई कयाक, पैडल बोट और बांस राफ्टिंग जैसी गतिविधियों ने न केवल पर्यटन को बढ़ावा दिया, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी खोले हैं। तुंगल की सबसे बड़ी पहचान इसके पर्यटन आकर्षण नहीं, बल्कि यहां से जुड़ी वे 10 महिलाएं हैं, जिन्होंने संघर्ष और दर्द से निकलकर आत्मनिर्भरता की नई राह चुनी। “तुंगल नेचर कैफे” के जरिए आत्मसमर्पण पुनर्वास महिला स्व सहायता समूह से जुड़ी इन महिलाओं में कुछ ने कभी नक्सलवाद का रास्ता अपनाया था, जबकि कुछ नक्सली हिंसा की पीड़ा झेल चुकी थीं। कैफे मे चाय, कॉफी, नाश्ता, मैगी, पास्ता और आर्डर पर खाना भी बनाया जाता है।जिला प्रशासन द्वारा दिए गए प्रशिक्षण ने इन महिलाओं के जीवन की दिशा बदल दी है। उन्होंने केवल खाना बनाना या कैफे चलाना ही नहीं सीखा, बल्कि आत्मविश्वास के साथ लोगों से संवाद करना और सम्मान के साथ जीवन जीना भी सीखा। कुहराम रामे, मुचाकी सोमे, मडकम पोज्जे, माड़वी बुदरी और कलमू पायके जैसी महिलाएं, जो कभी बंदूक के साये में थीं, आज मुस्कुराकर पर्यटकों का स्वागत करती हैं। वहीं मडकम रामे, पोडियम सरोज, अनीता मुचाकी, ललिता यादव और पुनेम भरत जैसी महिलाएं, जिन्होंने हिंसा का दर्द झेला, अब अपने परिवार और समाज के लिए उम्मीद की नई मिसाल बन रही हैं। 31 दिसंबर 2025 को शुरू हुए तुंगल इको-पर्यटन केंद्र ने कुछ ही महीनों में सफलता की नई कहानी लिख दी है। 25 मई 2026 तक यहां 10 हजार 369 पर्यटक पहुंच चुके हैं। लेकिन इस केंद्र की असली सफलता इन आंकड़ों में नहीं, बल्कि उन बदली हुई ज़िंदगियों में है, जिनमें अब डर की जगह आत्मविश्वास, और संघर्ष की जगह सम्मान ने ले ली है। तुंगल आज सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि यह संदेश है कि सही अवसर, विश्वास और मार्गदर्शन मिले तो हर जीवन नई शुरुआत कर सकता है।