0 बांस के पुल के सहारे नदी पार सेमलडोड्डी स्कूल जाते हैं शिक्षक
0 जरा सी चूक हुई नहीं कि जा सकती है जान
(अर्जुन झा) जगदलपुर। इस बात में कोई नहीं कि हमारा भारत पिछड़ेपन और विकासशील देश के साये से उबर कर अब विकसित राष्ट्र बनने की ओर तेजी से अग्रसर हो रहा है। हर क्षेत्र में हमने बड़ी कामयाबियां हासिल कर ली हैं। हम स्वदेशी और ऑर्गेनिक चीजों को बढ़ावा भी दे रहे हैं। वहीं दूसरी ओर विकसित भारत के एक हिस्से बस्तर से आज भी गाहे-बगाहे कुछ ऎसी तस्वीरें सामने निकल आती हैं, जो सिस्टम के गाल पर तमाचा मारती सी लगती हैं।
आदिवासी बहुल बस्तर संभाग भले ही नक्सलमुक्त हो गया है, मगर दशकों पुरानी समस्याओं से हमारा बस्तर मुक्त नहीं हो पाया है। बस्तर नदी, नालों, जंगलों और पहाड़ों की बहुलता वाला संभाग है। इस संभाग के ज्यादातर गांव नदी नालों से घिरे हुए हैं। इन दूर दराज के गांवों तक पहुंच पाना आज भी उतना ही कठिन बना हुआ है, जितना आदिम युग में हुआ करता था। अधिकांश नदी, नालों पर रपटों और पुल पुलियों का निर्माण नहीं हो पाया है।इन गांवों तक पहुंचने के लिए या तो लकड़ी की नाव का सहारा लेना पड़ता है, या फिर लकड़ी या बांस से निर्मित पुल का। कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा इलाके में उफान मारती नदी को लकड़ी की टूटी फूटी नाव से पार करते शिक्षकों की तस्वीर हमने कुछ दिन पहले ही दिखाई थी। आज हम आपको एक ऐसे ऑर्गेनिक पुल की तस्वीर दिखा रहे हैं, जो सिस्टम के लिए करारा तमाचा है। 21वीं सदी के विकसित भारत को मुंह चिढ़ाने वाली यह तस्वीर और खबर आई है बस्तर संभाग के बीजापुर जिले से। बीजापुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में आवागमन की समस्या बड़ी ही विकराल हो जाती है।बीजापुर के इलमीडी गांव के आवासपारा सेमलडोड्डी प्राथमिक और माध्यमिक शाला में पदस्थ शिक्षक तेज बारिश के बीच जान जोखिम में डालकर उफनते नाले को बांस से बने पुल के सहारे पार कर स्कूल पहुंचते हैं। नाले में पानी बढ़ने के बाद सामान्य रास्ते से स्कूल पहुंचना मुश्किल हो जाता है। इलमिड़ी संकुल से करीब चार किलोमीटर दूर स्थित आवासपारा सेमलडोड्डी की प्राथमिक और माध्यमिक शाला में पांच शिक्षक और एक भृत्य पदस्थ हैं। बारिश के दिनों में सेमलडोड्डी नाला उफान पर आने के बाद शिक्षकों के सामने स्कूल पहुंचने की चुनौती खड़ी हो जाती है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसलिए शिक्षक अपनी जान जोखिम में डाल कर बांस से निर्मित पुल के जरिए नाले को पार करके स्कूल पहुंचते हैं।
ग्रामीणों ने बनाया बांस का पुल
शिक्षक अचैय्या तोर्रेम ने बताया कि बारिश के मौसम में हर साल यही परेशानी सामने आती है। नाले में पानी बढ़ने पर स्कूल जाने में काफी कठिनाई होती है। पुराने स्टॉप डेम के ऊपर स्थानीय स्तर पर जुगाड़ कर बांस का रैंप बनाया गया है। इसी के सहारे नाला पार करना पड़ता है। नाले के नीचे बड़े-बड़े पत्थर हैं और बारिश के दौरान पानी का बहाव भी तेज रहता है। ऐसे में बांस के रैंप पर पैर फिसलने की स्थिति में गंभीर हादसा हो सकता है। शिक्षक बताते हैं कि नाला पार करते समय हर कदम बेहद सावधानी से रखना पड़ता है। इसके बावजूद बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें यह जोखिम उठाना पड़ रहा है।