गरीब, मजदूर, किसानों के सम्मान में बोरे-बासी दिवस का आयोजन करे सरकार – कांग्रेस

रायपुर। मजदूर दिवस पर पूरे प्रदेश में “बोरे-बासी उत्सव” के आयोजन की मांग करते हुए प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि बोरे-बासी केवल भोजन मात्र नहीं हमारी संस्कृति से जुड़ा है, मेहनतकश छत्तीसगढ़िया आम जनता की जीवन शैली है, हमारी अस्मिता का प्रतीक है। पूर्ववर्ती कांग्रेस की सरकार ने 1 मई 2020 से श्रमिकों के सम्मान और छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान के तौर पर आयोजन की शुरुआत की थी जिसे भाजपा की सरकार ने धूमिल कर दिया है।

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि सरकार का दायित्व जन कल्याणकारी योजनाओं के साथ ही प्रथा, परंपरा, संस्कृति, रीति-रिवाज और खानपान के संरक्षण और संवर्धन का भी है। भाजपा सरकार छत्तीसगढ़ में बिहार दिवस तो मनाती है, लेकिन छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान से भाजपा नेताओं को हिकारत है। प्रदेश की मिट्टी और संस्कृति से जुड़े इस पर्व को भाजपा की सरकार मिटाना चाहती है, जबकि लोग खुद अपनाने लगे हैं। सरकार दुर्भावन और पूर्वाग्रह छोड़कर आगामी 1 मई को बोरे-बासी दिवस का आयोजन करे।

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि भाजपा की प्राथमिकता में चंद पूंजीपति मित्रों का मुनाफा है, मजदूरों का शोषण करके पूंजीपतियों को पोषित कर रहे हैं। 41 श्रम कानूनों को खत्म करके मजदूर विरोधी 4 श्रम संहिता लादे गए, हाल ही में बालकों में 25 श्रमिकों की मौत हुई, अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं, विगत ढाई साल में 300 से अधिक मजदूर ने जान गवाए जिसके जिम्मेदार प्रबंधन के साथ ही सरकार भी है। श्रम विभाग और उद्योग विभाग कारखाना मालिकों की चाकरी में लगे हैं, सेफ्टी आडिट नहीं हो रहा है, सुरक्षा मानकों का पालन करने से अघोषित तौर पर छूट दे दिया गया है, नियमित भर्ती के बजाय कम मजदूरी में बिना प्रशिक्षण के जोखिम भरे काम करवाए जा रहे हैं, सरकार और प्रशासन मजदूरों के शोषण पर मूकदर्शक बनी है। श्रमिक दिवस के मौके पर आयोजन में इस सरकार को परहेज है।

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि आम जनता से निवाला छीनने वाले, हिटलर, मुसोलिनी और अंग्रेजों के चाटुकार, आयातित संस्कृति के संघी, भाजपाई टिफिन पर चर्चा का सरकारी इवेंट तो कर सकते हैं, पर बोरे-बासी दिवस मनाने में इन्हें शर्म आती है। बोरे-बासी समता और समानता का प्रतीक है, गांव के गरीब मजदूर से लेकर मालगुजार तक सभी वर्गों का प्रिय भोजन है लेकिन कॉर्पोरेट परस्त भाजपाइयों को इससे परहेज है। भ्रष्टाचारी सत्ताधारी नेता टिफिन में 56 भोग का दिखावा कर रहे हैं, काम का अधिकार तक तो छीन लिए, महंगाई और बेरोजगारी से आम जनता की थाली का भोजन पहले ही छीन लिया गया है, कम से कम मजदूरी दिवस पर साथ बैठ कर बोरे-बासी ही खा ले सरकार।

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