शहीद महेंद्र कर्मा विवि में अवैधानिक भर्ती का सिलसिला जारी; सरकार आखिर मौन क्यों?

0 कुलपति की मनमानी और भर्राशाही दौर जारी 
(अर्जुन झा)जगदलपुर। शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय का विवादों से पीछा नहीं छूट रहा है। यहां भर्ती घोटाला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। यूनवर्सिटी में नियुक्तियों में भारी भ्रष्टाचार की शिकायतों के बाद भी लगातार कुलपति की मनमानी जारी है।
अवैधानिक भर्ती में रूरल टेक्नोलॉजी में दुर्गेश डिकसेना का अवैधानिक चयन और मैनेजमेंट में अवैध भर्ती, केंद्रीय विश्वविद्यालय से पीएचडी डिग्रीधारी उच्च शिक्षित आदिवासी महिला अभयरथी को नाट फाउंड सुटेबल करना, जेआरएफ उत्तीर्ण विकलांग महिला को नाट फाउंड सुटेबल करने, ओबीसी सीट में जनरल का चयन करने, आरक्षण रोस्टर में गड़बड़झाला तथा अन्य मुद्दों पर बड़ी अनियमितता उजागर हुई थी। इसी बीच बड़ी जानकारी लगी है कि 15 जून को रविवार के अवकाश के दिन जनप्रतिनिधियों और कुलसचिव की अनुपस्थिति में मात्र अपने मातहत 6 प्रोफेसर सदस्यों को बुलाकर कार्य परिषद की बैठककर ली गई। इस बैठक में 7 असिस्टेंट प्रोफेसर, 1 एसोसिएट प्रोफेसर और 1 प्रोफेसर पद पर गुपचुप नियुक्ति कर दी गई।
जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ शिक्षाविद, विधायक, कुलसचिव समेत 16 कार्य परिषद सदस्य अनुपस्थित थे फिर भी लिफाफा खोल दिया गया। विदित हो कि शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद में कुलसचिव, विधायक सदस्यों, शिक्षाविद सदस्यों सहित कुल 22 सदस्य नामांकित हैं परंतु 15 जून को आयोजित कार्यपरिषद की बैठक में 22 में से 16 सदस्यों में विधायक, शिक्षाविद और कुलसचिव अनुपस्थित थे। इसके बावजूद कुलपति द्वारा मनमानी करते हुए अपने सहित अपने मातहत 5 सदस्यों डॉ. शरद नेमा, डॉ. सपन कोले (इन्हें पूर्व में कार्य परिषद द्वारा परीक्षा कार्य में गोपनीयता भंग करने के आरोप में दंडित किया गया था) डॉ. रानू मेश्राम (इनके पति विश्वविद्यालय के कर्मचारी हैं), डॉ. आरके हिरकने, डॉ. के इंदिरा, और ईश्वर तिवारी ( प्राइवेट कालेज प्रिंसपल) की उपस्थिति में ही लिफाफा खोल दिया गया, जो ये पांच सदस्य उपस्थित थे। उनमें से दो विश्वविद्यालय के ही प्रोफेसर हैं, और तीन सदस्य कालेज के प्रिंसिपल हैं। इस तरह मनमानी पूर्वक जनप्रतिनिधि सदस्यों की अनुपस्थिति में लिफाफा खोलने से कुलपति के मातहतों डॉ. शरद नेमा, डॉ. सपन कोले जिन्हें पूर्व में कार्य परिषद द्वारा परीक्षा कार्य में गोपनीयता भंग करने के आरोप में दंडित किया गया था, ईश्वर तिवारी, डॉ. रानू मेश्राम जिनके पति विश्वविद्यालय के कर्मचारी हैं मात्र की उपस्थिति पर भी संदेहास्पद भूमिका प्रतीत हो रहा है।

कुलसचिव रहे अनुपस्थित
आनन फानन में रविवार अवकाश के दिन बुलाई गई कार्य परिषद की बैठक में नियमित पीएससी चयनित कुलसचिव श्री लालवानी शामिल नहीं हुए। कुलपति द्वारा मनमानी पूर्वक इस बैठक में एक सहायक कुलसचिव देवचरण गावड़े को कुलसचिव का कार्यभार सौंप इस बैठक को अवैधानिक रूप से संपन्न किया गया। इस पर भी संदेहास्पद भूमिका कुलपति की रही है।

34 अभ्यर्थियों को किया अपात्र!
उल्लेखनीय है कि अंग्रेजी विषय में असिस्टेंट प्रोफेसर के 33 अभ्यर्थियों का इंटरव्यू 26 एवं 27 मई लगातार दो दिन लिया गया था, जिसमें सभी अभ्यर्थियों को मनमानी पूर्वक कुलपति द्वारा नाट फांउड सुटेबल करार दे दिया गया। इसी तरह ऐंथ्रोपोलाजी विषय में 34 अभ्यर्थियों का इंटरव्यू 30 एवं 31 मई को लगातार दो दिन हुआ था। इस इंटरव्यू में उच्च शिक्षित उपाधि प्राप्त अनेक आवेदक शामिल हुए परंतु सभी 34 उच्च शिक्षित आवेदकों को कुलपति मनोज श्रीवास्तव द्वारा भर्राशाही करते हुए सभी को नाट फांउड सुटेबल कर दिया गया। जो कि स्पष्ट रूप से पैसे देने वाले कैंडिडेट नहीं मिलने के कारण सभी 34 उच्च शिक्षित लोगों को नाट फांउड सुटेबल किया जाना प्रमाणित होता है। जिन पदों के लिए पैसा मिला उसमें मेरिट में बहुत पीछे के कैंडिडेट को ले लिया गया, और जिन पदों में पैसे नहीं मिले उसमें 34-34 उच्च शिक्षित उम्मीदवारों के होने के बाऊजूद नाट फांउड सुटेबल कर पोस्ट खाली रखना भारी भरष्टाचार और अनियमितता का सबूत है।

सूची में दो नाम वायरल

चयन सूची में राजनीति विज्ञान विषय में भुवनेश्वर साहू और बायोटेक्नोलॉजी विषय में नीरज वर्मा का नाम चयनित होने की खबर बहुत पहले ही फेसबुक सहित विभिन्न समाचारों और शिकायतों में साक्षात्कार पूर्व ही पैसों का लेनदेन कर चयन फिक्स वायरल हो चुकी थी। और इस चयन सूची में भुवनेश्वर साहू और नीरज वर्मा का नाम होने से भारी भ्रष्टाचार की पुष्टि भी हो रही है।

दावा निकला थोथा
कुलपति ने प्रेसवार्ता में दावा किया था कि 38 वर्ष से ऊपर वाले किसी अभ्यर्थी का चयन नहीं हुआ है,जबकि भुवनेश्वर साहू की आयु 49 वर्ष है। कुलपति मनोज श्रीवास्तव द्वारा बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस लेकर दावा किया गया था कि 38 वर्ष के ऊपर आयु के किसी भी उम्मीदवार का चयन नहीं हुआ है। जबकि सच्चाई यह है कि पॉलीटिकल साइंस विषय में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर चयनित भुवनेश्वर साहू का जन्म 1977 का है और वर्तमान में इनकी आयु 49 साल की है। भुवनेश्वर साहू के चयन से बिना शुद्धि पत्र और बिना संशोधित विज्ञापन के आयु सीमा शिथिल कर अवैधानिक भर्ती के आरोप भी प्रमाणित हो गया है।

शिक्षाविद सदस्य की अनदेखी
विदित हो कि कार्य परिषद के सबसे वरिष्ठ और अनुभवी शिक्षाविद सदस्य प्रोफेसर एसके पाण्डेय, पूर्व कुलपति, पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय को पहले के बैठकों में कुलपति द्वारा आनलाइन जोड़ा जाता था, परंतु पिछली दो बैठकों में प्रोफेसर एसके पाण्डेय की आनलाइन बैठक में जुड़ने की ईच्छा के बावजूद उन्हें बैठक में नहीं जोड़ा गया। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार प्रोफेसर एसके पाण्डेय दवारा शैक्षणिक भर्ती में हो रही अनियमितता पर सवाल उठाया गया था और वे कार्यपरिषद बैठक में भी इस मुद्दे पर चर्चा करना चाह रहे थे, परंतु कुलपति मनोज श्रीवास्तव द्वारा मनमानी पूर्वक कार्यपरिषद के सबसे वरिष्ठ और अनुभवी सदस्य की अनदेखी की गई।

अनसुनी रह गई शिकायतें
भर्ती घोटाले के खिलाफ भाजपा कांग्रेस के नेताओं ने भी आवाज उठाई, जिसे अनसुना कर दिया गया। इस सबंध में पूर्व भाजपा विधायक संतोष बाफना, पूर्व भाजपा विधायक राजाराम तोड़ेम, एनएसयूआई प्रदेश सचिव रंजनेश सिंह, वरिष्ठ कांग्रेस नेता उमाशंकर शुक्ला सहित अनेक आवेदकों और विभिन्न लोगों ने भी अप्रैल माह में राज्यपाल, उच्च शिक्षा विभाग छत्तीसगढ़ शासन को शिकायत करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को सूचित कर दिया था परंतु कुलपति द्वारा तमाम शिकायतों को दरकिनार कर मनमानी पूर्वक अवैधानिक भर्ती को जारी रखते हुए साक्षात्कार कर अवैध तरीके से कार्य परिषद की बैठक कर गुपचुप नियुक्ति कर रहे हैं। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार अब चूंकि अधिकांश विषयों में कुलपति मनमानी पूर्वक गलत आरक्षण रोस्टर पर भर्ती कर चुके हैं जिसके बचाव हेतु शिक्षा विभाग के पूर्व स्वीकृत व्याख्याता पदनाम के पदों को असिस्टेंट प्रोफेसर पदनाम और वेतनमान पर स्वीकृत कराने एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं ताकि इस स्वीकृति की प्रत्याशा में भर्ती के आरक्षण रोस्टर को सही दिखाया जा सके, परंतु कभी भी किसी भर्ती विज्ञापन में भविष्य में स्वीकृत या संशोधन की प्रत्याशा में ना तो भर्ती विज्ञापन निकाला जाता है और न ही साक्षात्कार कर अवैधानिक भर्ती की जाती है। चूंकि बहुत सारे महिला, विकलांग, आदिवासी उम्मीदवारों और गोल्ड मेडलिस्ट उम्मीदवारों ने विभिन्न फोरममों अनूसूचित जनजाति आयोग, महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, कुलाधिपति और समाजिक अधिकारिता मंत्रालय में लिखित नामजद शिकायत की है और लगातार इस भर्ती के भरष्टाचार पर खबरें छप रही हैं। ऐसे में तत्काल प्रशासन और शासन को स्वत: संज्ञान लेकर इसकी उच्च स्तरीय जांच कमेटी का गठन कर जांच करवानी चाहिए। जो संदेही चयनित हुए हैं उन सभी के बैंक खातों सहित कुलपति और इस भर्ती में शामिल सभी चयन समिति के सदस्यों के मोबाइल नंबर के काल डिटेल निकाले जाने चाहिए। 15 जून को हुई कार्य परिषद बैठक में कुलपति के मातहत सदस्य डॉ. शरद नेमा, डॉ. सपन कोले भी मौजूद रहे, जबकि इन्हें पूर्व में कार्य परिषद द्वारा परीक्षा कार्य की गोपनीयता भंग करने के आरोप में दंडित किया गया था एवं अन्य की भूमिका की भी जांच की जानी चाहिए।

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