रायगढ़ का पारंपरिक मेला संकट में: अनुमति नहीं मिलने से व्यापारियों और स्थानीय लोगों में चिंता

रायगढ़। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर हर वर्ष आयोजित होने वाला रायगढ़ का पारंपरिक मेला इस बार प्रशासनिक अनुमति के अभाव में अधर में लटका हुआ है। आयोजन स्थल पर अधिकांश तैयारियां पूरी हो चुकी हैं, लेकिन अंतिम स्वीकृति नहीं मिलने से व्यापारियों, झूला संचालकों, आयोजकों और स्थानीय नागरिकों के बीच अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।

आयोजन से जुड़े लोगों का कहना है कि यह मेला केवल मनोरंजन का आयोजन नहीं, बल्कि रायगढ़ की वर्षों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा और पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर वर्ष छत्तीसगढ़ के अलावा ओडिशा, झारखंड, मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों से व्यापारी यहां पहुंचते हैं। उनके अनुसार, मेला नहीं लगने की स्थिति में सैकड़ों छोटे व्यापारी, अस्थायी दुकानदार, झूला संचालक, मजदूर और अन्य लोगों के रोजगार पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

जन्माष्टमी मेले में बच्चों के लिए झूले, मनोरंजन के साधन, खिलौने, कपड़े, हस्तशिल्प, घरेलू उपयोग की वस्तुएं और खान-पान के स्टॉल प्रमुख आकर्षण होते हैं। हर साल बड़ी संख्या में लोग यहां खरीदारी और मनोरंजन के लिए पहुंचते हैं, जिससे शहर के होटल, परिवहन, छोटे व्यापारियों और स्थानीय बाजारों को भी आर्थिक लाभ मिलता है।

व्यापारियों और आयोजन समिति का कहना है कि यदि प्रशासन को यातायात, सुरक्षा या कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता है, तो आवश्यक प्रबंधों के साथ मेला आयोजित कराया जा सकता है। उनका मानना है कि पूर्ण प्रतिबंध से न केवल स्थानीय व्यापार और रोजगार प्रभावित होगा, बल्कि रायगढ़ की एक पुरानी सांस्कृतिक परंपरा भी कमजोर पड़ सकती है।

स्थानीय नागरिकों ने भी प्रशासन से आग्रह किया है कि सुरक्षा और यातायात की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करते हुए मेले के आयोजन की अनुमति दी जाए। उनका कहना है कि यह आयोजन शहर की सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक सहभागिता और स्थानीय अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है।

फिलहाल प्रशासन के अंतिम निर्णय का इंतजार किया जा रहा है। यदि अनुमति नहीं मिलती है, तो आयोजन से जुड़े लोगों का कहना है कि इसका प्रभाव केवल मेले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे स्थानीय रोजगार, व्यापार और वर्षों से चली आ रही जन्माष्टमी मेले की परंपरा भी प्रभावित होगी।