

0 बर्बाद हो गई सैकड़ों एकड़ खेती, बिगड़ रही है ग्रामीणों की सेहत
0 त्रस्त ग्रामीणों ने कलेक्टर से लगाई न्याय की गुहार
(अर्जुन झा)जगदलपुर। बस्तर संभाग में लाल और काले पानी का कहर जारी है। जहां बस्तर संभाग के बस्तर जिले के कई गांवों में काला पानी कहर बरपा रहा है, वहीं दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल में लाल पानी और लाल कीचड़ ने कोहराम मचा रखा है। काले और लाल पानी तथा लाल कीचड़ से सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि पूरी तरह तबाह हो चुकी है। यह दूषित पानी ग्रामीणों की सेहत पर भी भारी पड़ रही है।
बस्तर के जिला मुख्यालय जगदलपुर के करीब स्थित नगरनार में एनएमडीसी द्वारा स्थापित इस्पात संयंत्र से निकलने वाले केमिकलयुक्त काले पानी ने नगरनार सहित आसपास के गांवों में बड़ी तबाही मचा रखी है। संयंत्र के गेट नंबर 3 से निकलने वाले इस जहारीला पानीने जगदलपुर मार्ग पर जाम के हालात पैदा कर दिए हैं। पक्की सड़क पर भरे डेढ़ से दो फीट पानी की वजह से मार्ग पर आवागमन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। वहीं बुरी तरह प्रदूषित हो चला यह काला पानी खेतों और तालाबों में भी पहुंच रहा है। इस पानी के असर से पचासों एकड़ खेत बंजर हो गए हैं, तालाबों का पानी प्रदूषित हो चला है। इस पानी से पेयजल स्त्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं। इतने बड़े नुकसान के बावजूद एनएमडीसी और नगरनार प्लांट प्रबंधन अपने केमिकलयुक्त दूषित जल के सुरक्षित प्रबंधन पर जरा भी ध्यान नहीं दे रहे हैं।
किरंदुल की ये है त्रासदी
इसी तरह दंतेवाड़ा जिले के नगर पालिका क्षेत्र किरंदुल के वार्ड क्रमांक 18, नड़ियां पारा के निवासी इन दिनों प्राइवेट कंपनियों के भारी वाहनों और औद्योगिक प्रदूषण के कारण नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। सड़क पर जमा लाल कीचड़, नदी-नालों में मिलता दूषित पानी और टूटी-फूटी सड़कें यहां के लगभग 550 लोगों के लिए बड़ी समस्या बन गई हैं।
कलेक्टर से शिकायत
स्थानीय निवासी प्रवेश कुमार जोशी ने इस संबंध में जिला कलेक्टर दंतेवाड़ा को एक विस्तृत आवेदन सौंपकर तत्काल जांच और कार्रवाई की मांग की है। श्री जोशी के अनुसार वार्ड 18 की अनुमानित 150 की जनसंख्या सीधे तौर पर प्रभावित है। इनमें लगभग 25 स्कूली बच्चे शामिल हैं जिन्हें कीचड़ भरे रास्ते से होकर स्कूल जाना पड़ता है। इसके अलावा किरंदुल बस्ती और आसपास के करीब 400 लोग भी इस समस्या से जूझ रहे हैं।सड़क पर लाल रंग का कीचड़ और पानी भरा हुआ है। इसी मार्ग से प्राइवेट कंपनियों के डंपर और भारी वाहन गुजरते हैं, जिससे स्थिति और बिगड़ गई है।
लाल कीचड़ का कोहराम
बताया गया है कि कंपनियों से निकलने वाला लाल कीचड़युक्त पानी सीधे नदी और नालों में मिल रहा है। इससे भूजल दूषित हो रहा है और पीने के पानी का संकट गहरा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि इससे पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है।कीचड़ और जर्जर सड़क के कारण आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस का गांव तक पहुंचना मुश्किल हो गया है। वहीं स्कूली बच्चों के लिए कोई परिवहन सुविधा उपलब्ध नहीं है, जिससे उनकी शिक्षा बाधित हो रही है। श्री जोशी ने कलेक्टर से जांच दल गठित कर स्थल का निरीक्षण कराने और पर्यावरण नियमों के उल्लंघन पर कंपनी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने, प्राइवेट कंपनियों को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, जल अधिनियम और सीएसआर नियमों के तहत अपनी जिम्मेदारियां निभाने हेतु निर्देशित करने, शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने, नदी-नालों को प्रदूषण मुक्त करने की मांग की है। कंपनियों के माध्यम से स्वच्छ परिवहन के लिए वैकल्पिक मार्ग एवं पक्की सड़कों का निर्माण कराने, क्षेत्र के स्कूली बच्चों के लिए निःशुल्क बस सुविधा उपलब्ध कराने की भी मांग की गई है।
कानून में हैं ये प्रावधान
कानून विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी कंपनी प्रबंधन द्वारा औद्योगिक अपशिष्ट नदी-नालों में छोड़ा जा रहा है तो यह जल अधिनियम 1974 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 का घोर उल्लंघन है। इसके तहत कंपनी पर भारी जुर्माना और दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। साथ ही कंपनी अधिनियम 2013 के तहत कंपनियों के लिए सीएसआर के अंतर्गत लाभ का 2 प्रतिशत हिस्सा परिधीय क्षेत्र के गांवों शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर खर्च करना अनिवार्य है। ग्रामीणों ने प्रशासन से शीघ्र हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा है कि ग्रामवासियों का जीवन, पर्यावरण और भविष्य की रक्षा करना हम सभी का दायित्व है।