लोक वैद्यों को आयुष्मान योजना से जोड़ने की मांग

० शहीद गुंडाधुर कृषि महाविद्यालय जगदलपुर में लोक वैद्यों का कार्यक्रम 
जगदलपुर। शहीद गुंडाधुर कृषि महाविद्यालय कुम्हारवंड जगदलपुर में 20 मई को परंपरागत लोक वैद्यों का सफल एवं भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह आयोजन छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय बस्तर, छत्तीसगढ़ विज्ञान भारती संस्थान एवं जलवायु परिवर्तन विभाग छत्तीसगढ़ शासन के तत्वावधान में सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों से आए पारंपरिक वैद्य, ग्राम पदाधिकारी एवं समाज के गणमान्य सदस्य भारी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक वैद्य एवं ग्राम पदाधिकारी संघ छत्तीसगढ़ के संरक्षक जयनारायण सिंह बस्तरिया के संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि बस्तर क्षेत्र सदियों से जड़ी-बूटी एवं वनौषधियों का समृद्ध केंद्र रहा है तथा यहां अपार संभावनाएं मौजूद हैं, जिन्हें संरक्षित और विकसित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी विजन है कि परंपरागत ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़कर कम लागत में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पूरे विश्व तक पहुंचाई जा सकती हैं। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पारंपरिक वैद्य एवं ग्राम पदाधिकारी संघ छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष प्रेमसागर एबोरिजनल ट्राइब्स ने कहा कि बस्तर के जंगलों में अति दुर्लभ औषधीय वनस्पतियां पाई जाती हैं, जिनके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों के लोक वैद्य सदियों से गंभीर बीमारियों का उपचार करते आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि लोक वैद्य आधुनिक विज्ञान के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ें। उन्होंने शासन एवं प्रशासन से मांग की कि लोक वैद्यों को आयुष्मान योजना से सीधे जोड़ा जाए तथा शासन द्वारा संचालित आयुर्वेद अस्पतालों से समन्वय स्थापित किया जाए, ताकि पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को उचित पहचान और सम्मान मिल सके। इस अवसर पर उन्होंने अनेक वनौषधियों एवं उनके औषधीय उपयोगों की जानकारी भी साझा की। उन्होंने आगे कहा कि बस्तर क्षेत्र के लोग अपने पारंपरिक खान-पान में सदियों से मंडिया, कोदो, कुटकी, रागी, कुल्थी, बाजरा जैसी पौष्टिक फसलों का उपयोग करते आ रहे हैं, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी हैं। साथ ही अनेक प्रकार की वनस्पतियों, फल-फूल एवं भाजियों का सेवन यहां की संस्कृति और जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। अंत में उन्होंने कार्यक्रम के आयोजकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन पारंपरिक ज्ञान, लोक चिकित्सा और जनजातीय विरासत को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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