छत्तीसगढ़ का पहला वस्त्रधारी शिवलिंग!

० वनवास के दौरान भगवान श्रीराम ने यहां की थी 2 वर्ष तक पूजा 
०  श्रीराम के प्रवास के कारण गांव का नाम रखा गया है रामपाल 
(अर्जुन झा) जगदलपुर। बस्तर की धरा अपने दामन में प्रचुर खनिज और वन संपदा ही नहीं, बल्कि वैभवशाली सांस्कृतिक विरासत भी समेटे हुए है। यह तो सर्व विदित तथ्य है कि भगवान श्रीरामचंद्र के पावन चरण बस्तर की धरा पर पड़े थे। यहां एक ऐसा अति प्राचीन शिवलिंग भी है, जो वस्त्रधारी है। यह छत्तीसगढ़ का पहला और इकलौता वस्त्रधारी शिवलिंग है।
जगदलपुर शहर से 14 किलोमीटर दूर स्थित रामपाल गांव के मंदिर में भगवान शिव की 5वीं शताब्दी के दौरान भव्य मंदिर शिवलिंग ध्वस्त जमीन में मिला था। भगवान राम ने अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान 2 वर्ष दंडकारण्य यानि बस्तर के भूभाग में बिताए थे। वे यहां पर शिव आराधना और पूजा पाठ करने के साथ साथ कंद मूल खाकर समय व्यतीत करते थे। राम के आने के कारण ही गांव का नाम रामपाल रखा गया है। इस मंदिर की सबसे खास बात है कि पूरे छत्तीसगढ़ का यह पहला शिव मंदिर है, जहां शिवलिंग को वस्त्र पहनाया गया है।श्रद्धालुओं का कहना है कि इस शिवलिंग में भगवान शिव के साथ ही माता पार्वती भी विराजमान है, इसलिए इस मंदिर में शिवलिंग को कपड़ा पहनाया गया है।
रामपाल मंदिर के मुख्य पुजारी कैलाश ठाकुर ने बताया कि 5वीं शताब्दी में पूर्वजो को उस ध्वस्त पड़े मंदिर में शिवलिंग दिखाई दिया था। जिसके बाद गांव वालों ने इस बात की जानकारी अन्य माध्यमों से बावड़ी माता को दी। बावड़ी माता ने बताया कि ध्वस्त पड़े मंदिर के नीचे भगवान शिव की प्रतिमा हैं, जिसे निकालकर मेरे मंदिर के सामने द्वारपाल के रूप में स्थापित किया जाए। माता को बताने के बाद गांव वालों ने मंदिर की जमीन की खुदाई की तो वहां जमीन के अंदर गहराई तक धंसा शिवलिंग मिला। गांव वालों ने उस शिवलिंग को बाहर निकालने के लिए 32 फीट तक खुदाई की। लेकिन जमीन से लेकर पाताल तक जुड़े होने के कारण उसे बाहर नही निकाला जा सका। जिसके कारण उस शिवलिंग की वहीं स्थापना कर दी गई। जब यह शिवलिंग खुदाई में मिला था तब उसकी ऊंचाई सिर्फ 18 इंच की थी। लेकिन वर्तमान में इस शिवलिंग की ऊंचाई 1 मीटर हो चुकी है। जन श्रुति है कि बावड़ी माता प्रति वर्ष भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव पर चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन खुद पूजा करने के लिए इस मंदिर में आती हैं। तब से इस परंपरा को निभाया जा रहा है। पुजारी के अनुसार मंदिर में सेवा पूजा उनसे पहले के 6 पीढ़ियां लगातार लगातार करती आई हैं। यह बात भी बताया गया है कि 14 वर्ष के वनवास के दौरान श्रीराम, माता सीता व लक्ष्मण जी यहां रुककर पूजा अर्चना करते थे, इसलिए इस मंदिर का नाम भी रामपाल रखा गया।

बाणासुर था शिवजी का भक्त
बताया जाता है कि इस जंगल में बाणासुर नामक एक राक्षस का राज था। राक्षस बाणासुर खुद भी भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। लंबे समय तक इस जंगल में रहकर बाणासुर ने भगवान की तपस्या करते हुए उसकी आराधना भी की थी।

लंदन की गवर्नर ने चढ़ाई थी घंटी
मंदिर की खुदाई के दौरान एक घंटी मंदिर परिसर में मिली थी। इस घंटी में सन 1806 अंकित है। पूर्वजों का मानना है कि लंदन की लेडी गवर्नर ने यहां आकर भगवान शिव की प्रतिमा को देखने के बाद यह घंटी को श्रद्धा भाव से चढ़ाई थी। मंदिर के मुख्य पुजारी के अनुसार इस मंदिर के निर्माण के लिए ईंटों का उपयोग किया गया था। ये इंटें पांचवी शताब्दी की हैं और आज भी दिखाई दे रही हैं। यहां दूर दूर से लोग भगवान के दर्शन करने के लिए आते हैं।