छग कंटिनेटल सुपर स्पेशलिटी हॉस्पीटल में हुए ब्रेन ऑपरेशन पर गंभीर सवाल

० ब्रेन ऑपरेशन के बाद जिंदगी और मौत से जूझ रहा आदिवासी युवक 
०  परिजनों ने कंटिनेंटल अस्पताल में इलाज को लेकर गंभीर आरोप 
(अर्जुन झा)जगदलपुर। सरकारी मदद और एनएमडीसी के सहयोग से जगदलपुर के डिमरापाल में स्थापित छत्तीसगढ़ कंटिनेंटल सुपर स्पेशलिटी हॉस्पीटल अब विवाद और आरोपों के घेरे में आ गया है। इस अस्पताल में 28 वर्षीय आदिवासी युवक के इलाज को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि युवक के ब्रेन के ऑपरेशन में बरती गई गंभीर लापरवाही के चलते इस आदिवासी युवक की जान दांव पर लग गई है। फिलहाल युवक का इलाज विशाखापट्टनम के एक निजी अस्पताल में चल रहा है और उसकी हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है।
करकापाल के बड़ेपारा निवासी आदिवासी मजदूर युवक भोला कश्यप इस समय विशाखापट्टनम के एक अस्पताल में गंभीर हालत में उपचाराधीन है। परिजनों का आरोप है कि टीबी के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे भोला की हालत बिगड़ने के बाद उसके मस्तिष्क में पानी भरने की बात कही गई। इसके बाद उसका ब्रेन ऑपरेशन किया गया। परिजनों के मुताबिक ऑपरेशन के बाद युवक को होश नहीं आया और उसकी हालत लगातार गंभीर बनी हुई है। इन आरोपों की स्वतंत्र चिकित्सकीय पुष्टि अभी नहीं हुई है।

वहीं संबंधित अस्पताल का इस पूरे मामले में आधिकारिक पक्ष सामने आना भी बाकी है। परिजनों के अनुसार, पिछले महीने भोला कश्यप की तबीयत खराब होने पर उसे डिमरापाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया था। जांच के बाद चिकित्सकों ने उसे टीबी से पीड़ित बताया और करीब पांच दिन तक अस्पताल में भर्ती रखकर टीबी की दवाएं दी गईं।परिजनों का कहना है कि इसके बाद उन्होंने चांदनी चौक के पास एक निजी स्थान पर विशाखापट्टनम से आए डॉक्टर से भी भोला को दिखाया।परिवार के मुताबिक वहां टीबी की दवाएं बंद कर दूसरी दवाएं शुरू कराई गईं। लगभग दस दिन तक दवा लेने के बाद भोला की हालत और कमजोर हो गई। हालत बिगड़ने पर 2 अगस्त को भोला को दोबारा डिमरापाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया। परिजनों के अनुसार वहां सिटी स्कैन कराया गया। मेडिकल कॉलेज में एमआरआई की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें बाहर एमआरआई कराने की सलाह दी गई। इसी सिलसिले में परिजन भोला को छत्तीसगढ़ सुपर स्पेशलिटी कंटिनेंटल अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां एमआरआई की जांच के लिए लगभग 11 हजार रुपये खर्च बताए जाने की बात परिवार ने कही है। इसके बाद 5 अगस्त को भोला को छत्तीसगढ़ सुपर स्पेशलिटी कंटिनेंटल अस्पताल में भर्ती कराया गया। परिजनों का दावा है कि इसी दौरान डॉक्टर पवन कुमार ब्रिज ने परिवार को मरीज का इलाज कर ठीक करने का भरोसा दिया। परिवार के अनुसार 8 अगस्त को उन्हें बताया गया कि भोला के ब्रेन में पानी भर गया है और ऑपरेशन करना जरूरी है।

ऑपरेशन के बाद नहीं आया होश
टीबी के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे परिवार के लिए यह जानकारी बेहद चिंताजनक थी। परिजनों का कहना है कि बेटे की जिंदगी बचाने की उम्मीद में उन्होंने ऑपरेशन के लिए सहमति दे दी। परिवार के मुताबिक 9 अगस्त को भोला का ब्रेन ऑपरेशन किया गया।परिजनों का आरोप है कि ऑपरेशन के बाद भोला को होश नहीं आया और उसकी स्थिति गंभीर बनी रही। परिवार के अनुसार, इसी दौरान अस्पताल में काम करने वाले एक व्यक्ति ने कथित रूप से उन्हें बताया कि मरीज के बचने की संभावना बेहद कम है और उसे किसी अन्य अस्पताल में ले जाना बेहतर होगा।परिजनों का कहना है कि इस जानकारी के बाद परिवार पूरी तरह टूट गया और उन्होंने भोला को बेहतर उपचार के लिए दूसरे शहर ले जाने का फैसला किया। परिवार के अनुसार 13 अगस्त की रात भोला को विशाखापट्टनम ले जाया गया, जहां उसे केयर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। फिलहाल उसका उपचार जारी है। परिजनों का दावा है कि वहां चिकित्सकों ने पूर्व में किए गए ऑपरेशन को लेकर सवाल उठाए और ऑपरेशन के तरीके को लेकर गंभीर आपत्ति जताई। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र चिकित्सकीय रिपोर्ट या दस्तावेज सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं। इसलिए ऑपरेशन को ‘गलत’ ठहराने संबंधी दावे की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

इलाज में 2 लाख रुपए खर्च
भोला का परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर बताया जा रहा है। वह मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करता है। परिजनों का कहना है कि कंटिनेंटल अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने किसी तरह करीब 30 हजार रुपये जमा किए और शेष इलाज आयुष्मान कार्ड के माध्यम से होने की बात कही गई।परिवार का दावा है कि विशाखापट्टनम पहुंचने के बाद उपचार में अब तक करीब 1 लाख 80 हजार रुपये खर्च हो चुके हैं। परिजनों के मुताबिक भोला को बचाने के लिए घर में रखा सोना तक बेचना पड़ा और अब परिवार के सामने जमीन बेचने की नौबत आ गई है।

अस्पताल की सुविधाओं पर सवाल
मामले में परिजनों ने अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था और ऑपरेशन से पहले की प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठाए हैं। हालांकि इन आरोपों की जांच आवश्यक है।उल्लेखनीय है कि कंटिनेंटल अस्पताल की आधिकारिक वेबसाइट पर न्यूरो सर्जरी एवं स्पाइन सर्जरी विभाग के साथ एनेस्थीसियोलॉजी जैसी सेवाओं का उल्लेख है। अस्पताल की वेबसाइट पर डॉ. पवन ब्रिज को कंसल्टेंट न्यूरोसर्जन बताया गया है और ब्रेन सर्जरी सहित कई न्यूरोसर्जिकल प्रक्रियाओं की जानकारी दी गई है। इसलिए परिजनों द्वारा एनेस्थीसिया अथवा अन्य विशेषज्ञ सुविधाओं को लेकर लगाए गए आरोपों की वास्तविक स्थिति अस्पताल के रिकॉर्ड, ऑपरेशन नोट, एनेस्थीसिया रिकॉर्ड और संबंधित चिकित्सकीय दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

जरूरी हैं इन सवालों के जवाब
भोला कश्यप के मामले ने बस्तर की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। सवाल ये हैं कि टीबी के इलाज के दौरान भोला की न्यूरोलॉजिकल स्थिति कब और कैसे बिगड़ी? ब्रेन में पानी भरने की पुष्टि किन जांचों के आधार पर हुई? ऑपरेशन से पहले कौन-कौन सी जांच और विशेषज्ञ राय ली गई? ऑपरेशन के लिए क्या स्पष्ट चिकित्सकीय कारण दर्ज किया गया था? ऑपरेशन के बाद मरीज की हालत क्यों बिगड़ी? मरीज को ऑपरेशन के बाद किस प्रकार की पोस्ट ऑपरेटिव और आईसीयू देखभाल की गई? क्या मरीज और उसके परिजनों को ऑपरेशन के जोखिम और संभावित परिणामों की पूरी जानकारी दी गई थी? विशाखापट्टनम के अस्पताल में किए गए परीक्षणों और पूर्व ऑपरेशन के संबंध में चिकित्सकीय राय क्या है? यह मामला किसी एक परिवार की परेशानी तक सीमित नहीं है। यदि परिजनों के आरोप सही साबित होते हैं तो मामला गंभीर चिकित्सा लापरवाही का हो सकता है। वहीं यदि उपचार चिकित्सकीय मानकों के अनुरूप हुआ है तो अस्पताल के पास संबंधित मेडिकल रिकॉर्ड और विशेषज्ञ रिपोर्ट के माध्यम से स्थिति स्पष्ट करने का पूरा अवसर है।ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। ऑपरेशन से पहले और बाद के सभी मेडिकल रिकॉर्ड, सीटी स्कैन, एमआरआई रिपोर्ट, ऑपरेशन नोट, एनेस्थीसिया रिकॉर्ड, दवाओं का विवरण तथा विशाखापट्टनम में किए जा रहे उपचार की रिपोर्ट की विशेषज्ञों से समीक्षा कराई जानी चाहिए।फिलहाल भोला कश्यप की जिंदगी सबसे बड़ा सवाल बनी हुई है। एक गरीब आदिवासी परिवार अपने बेटे को बचाने के लिए आर्थिक और मानसिक संकट से गुजर रहा है। परिवार को उम्मीद है कि बेहतर उपचार से भोला की हालत सुधरेगी और वह फिर अपने घर लौट सकेगा। यह खबर में अस्पताल और चिकित्सकों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को परिजनों के कथन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। आरोपों की स्वतंत्र चिकित्सकीय पुष्टि अभी बाकी है।