आज हरेली अमावस्या है। आज छत्तीसगढ़ में हरेली तिहार मनाया जाता है। इस पर्व में कृषि औजारों की पूजा की जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में गेड़ी दौड़ और नारियल फेंक जैसे पारंपरिक खेल होते है। बस्तर क्षेत्र में अमूस पर्व होता है जिसमें रसना और शतावरी जैसी जड़ी बूटियां तेंदू की लकड़ी के साथ खेत में लगाई जाती है। यह धान की फसल को कीट पतंगों से सुरक्षित रखने की पुरानी परंपरा का सांकेतिक पर्व है।
इसके अतिरिक्त बस्तर में आज पाट जात्रा की रस्म भी निर्वहन की जाती है। यह रस्म मुख्य तौर पर देवी दंतेश्वरी माई के रथ निर्माण से जुड़ी रस्म है। दशहरा के अवसर पर देवी दंतेश्वरी माई के छत्र को रथ आरूढ़ कर भ्रमण कराया जाता है। प्रत्येक वर्ष एक रथ नया बनाया जाता है और एक रथ पुराना रहता है।
पाट जात्रा की रस्म में बस्तर के बिलौरी गांव से साल पेड़ की मोटी लकड़ी लाई जाती है जिसे टूरलु खोटला कहते हैं। इस पेड़ के तने को बकरे और मोंगरी मछली की बलि दी जाती है। इस रस्म में बस्तर रियासत के मांझी, चालकी, राजा के प्रतिनिधि, गणमान्य प्रतिनिधि और जिले के प्रमुख अधिकारी शामिल होते हैं।
इस लकड़ी के तने से विशाल रथ बनाने के लिए प्रयुक्त औजारों के बेंठ बनाए जाते है। पाट जात्रा की रस्म बस्तर दशहरा के रथ निर्माण से जुड़ी पहली रस्म है। इसके बाद काछिनगादी अर्थात आश्विन अमावस्या तक रथ निर्माण की विभिन्न रस्मों का निर्वहन किया जाता है। ज्ञात हो कि बस्तर दशहरा बस्तर अधिष्ठात्री मां दंतेश्वरी माई जी के रथ यात्रा का पर्व है।
यह बस्तर दशहरा रथ यात्रा पर्व बस्तर राजा पुरुषोत्तम देव द्वारा पंद्रहवीं सदी के अंत में जगन्नाथपुरी की यात्रा के बाद चक्रकोट (बस्तर)राज्य में प्रारंभ किया था। राजा पुरुषोत्तम देव को जगन्नाथ पुरी से बारह पहिए का सुभद्रा रथ प्राप्त हुआ था जिसे राजा पुरुषोत्तम ने आठ और चार पहिए के रथ में परिवर्तित किया था। वर्तमान बस्तर दशहरा मूलत तत्कालीन माणिक्य देवी वर्तमान दन्तेश्वरी माईजी की रथयात्रा है जिसे भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा की तर्ज पर प्रारम्भ किया गया था।
ओम प्रकाश सोनी
असिस्टेंट प्रोफेसर इतिहास