जगदलपुर। विश्व आदिवासी दिवस के उपलक्ष्य में शनिवार को शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय के मानव विज्ञान एवं जनजातीय अध्ययनशाला में व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ स्वपन कुमार कोले ने वन-आधारित आजीविका उपायों के माध्यम से जनजातीय विकास के बारे में विस्तृत जानकारी दी। डॉ कोले ने कहा कि जंगल जनजातीय समाज की पहचान और आजीविका के आधार हैं। वनाधारित आजीविका जनजातीय समाज को आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से सशक्त बनाते हुए विकास का ऐसा मॉडल प्रस्तुत करती है जो प्रकृति और परंपरा दोनों के साथ संतुलन बनाए रखता है।
इस अवसर पर एसोसिएट प्रोफेसर डॉ सुकृता तिर्की ने बस्तर के आदिवासी समाज की मूल संस्कृति विषय पर अपने विचार रखे। डॉ तिर्की ने कहा कि बस्तर के आदिवासी समाज की अपनी विशिष्ट भाषा-बोली, रहन-सहन, खानपान, भौगोलिक क्षेत्र हैं। यहां का आदिम समाज अपनी मूल संस्कृति में प्रकृति, सामूहिकता और परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है। गोटुल जैसी सामाजिक संस्था युवाओं को अनुशासन, शिक्षा और सामूहिक जीवन का पाठ पढ़ाती हैं। डाॅ. तिर्की ने कहा कि आदिवासी समाज को उनके अधिकारों एवं पेशा कानून के माध्यम से मुख्यधारा के विकास से जोड़ा जा सकता है।
इस अवसर पर शिवम, अनामिका मंडावी, मनीराम ने विश्व आदिवासी दिवस की एतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में भाषण एवं गीत के माध्यम से अपने विचार रखे। इससे पहले अपने स्वागत उद्बोधन में अतिथि व्याख्याता डॉ. लखन लाल विश्वकर्मा ने कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति के साथ संतुलन में जीने का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करता है। वन, जल और भूमि उनके लिए केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदाता हैं। मंच संचालन डॉ शारदा देवांगन ने किया। इस अवसर पर डॉ प्रकाश, विभिन्न विभागों के छात्र-छात्राओं का सराहनीय भागीदारी रही।