० न मुआवजा मिला, न नौकरी का ठिकाना
दंतेवाड़ा। बचेली से नगरनार तक 3,500 करोड़ की लागत से बिछ रही एनएमडीसी की स्लरी पाइप लाइन परियोजना को “विकास” का नाम दिया गया है, लेकिन हकीकत में यह परियोजना बस्तर के ग्रामीणों के आंसुओं और एक मासूम के खून से सनती जा रही है। पहली कड़ी में हमने बताया था कि मानसून में प्रतिबंध के बावजूद 10-10 फीट गहरे गड्ढे बिना बैरिकेडिंग के छोड़े जा रहे हैं। अब दूसरी कड़ी में वह सच्चाई है जो किसी भी “नवरत्न” कंपनी के दावों की पोल खोलती है।
गीदम ब्लॉक के हाउरनार गांव में पाइपलाइन खुदाई के कारण बना पानी से भरा गड्ढा मौत का कुआं बन गया। एक ही परिवार के भाई-बहन उसमें डूब गए। ग्रामीणों ने बहन को तो बचा लिया, लेकिन मासूम भाई ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। हादसे के बाद एनएमडीसी और ठेकेदार कंपनी एल एंड टी के अधिकारियों ने पीड़ित परिवार के आश्रित को स्थायी नौकरी और उचित मुआवजा देने का वादा किया था। मामला ठंडा होते ही दोनों वादे कागज के टुकड़े बन गए। चंद रुपयों की “सहानुभूति राशि” फेंककर एलएंडटी ने पल्ला झाड़ लिया।
संविधान बनाम लापरवाही
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 उल्लेख है कि किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि जीवन का अधिकार सिर्फ सांस लेने तक सीमित नहीं है, इसमें “गरिमा के साथ जीने का अधिकार” और “सुरक्षित माहौल” भी शामिल है। लेकिन हाउरनार में क्या हुआ?सार्वजनिक भूमि पर बिना बैरिकेडिंग, बिना चेतावनी बोर्ड के 10 फीट गहरे गड्ढे खोद दिए गाए। यह सीधे तौर पर आपराधिक लापरवाही आईपीसी 304 ए का मामला है। हादसे के बाद भी सुरक्षा ऑडिट नहीं करना जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। वादा करके मुकर जाना विश्वासघात और शोषण की श्रेणी में आता है। क्या एक नवरत्न कंपनी संविधान से ऊपर है?
30 किमी का सफर और टूटती आस
आज उस मासूम की मां गंगा ठाकुर दूसरों के घरों में बर्तन-झाड़ू करके 2 बेटियों का पेट पाल रही हैं। न्याय के लिए उन्हें पेशी की हर तारीख में 30 किमी दूर अदालत के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।इस लाचार मां का कहना है कि हमारे पास न गाड़ी है न बड़े वकील। बस उम्मीद है कि कानून अमीर-गरीब एक जैसा देखेगा। एक तरफ अरबों का बजट और प्रशासनिक संरक्षण वाली कंपनी है। दूसरी तरफ एक लाचार मां। क्या संविधान के अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता का मतलब सिर्फ किताबों तक रह गया है? एलएंडटी ने स्थायी नौकरी और मुआवजे का वादा क्यों नहीं निभाया? एनएमडीसी ने ठेकेदार पर कार्रवाई क्यों नहीं की? पिछले साल की मौत के बाद भी इस साल फिर बिना बैरिकेडिंग गड्ढे क्यों? क्या पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 और फैक्ट्री एक्ट कागज के लिए हैं? आपराधिक लापरवाही के बाद भी एलएंडटी को काम की छूट किसके इशारे पर मिली? क्या अनुच्छेद 39 में लिखा “राज्य कमजोरों के शोषण से रक्षा करेगा” सिर्फ भाषण है? यह सिर्फ मुआवजे की लड़ाई नहीं, व्यवस्था की लड़ाई है।
यह मामला सिर्फ एक मां की नौकरी या पैसे का नहीं है। यह उस सोच के खिलाफ है जहां “विकास” के नाम पर गरीब, आदिवासी और कमजोर की जान सस्ती हो जाती है। अब गेंद एनएमडीसी प्रबंधन और दंतेवाड़ा प्रशासन के पाले में है। क्या वो नवरत्न कंपनी के रसूख के आगे झुकेंगे, या संविधान के आगे सिर नवाएंगे? क्या कानून इस मां के आंसुओं का हिसाब लेगा, या पैसों की चमक तले इंसाफ दब जाएगा?