रिटर्न गिफ्ट में मिली एपीओ की कुर्सी से चिपका बैठा है कर्मचारी

०  तबादले के दो साल बाद भी नहीं हुए रिलीव 
०  पूर्व मंत्री की सेवा के बदले हासिल कर लिया है “साहब” का रुतबा 
(अर्जुन झा)जगदलपुर। बस्तर संभाग में मामूली सरकारी कर्मचारी भी बड़े जलवेबाज होते हैं। उनकी जलवानुमाई के नजारे गाहे बगाहे देखने को मिलते ही रहते हैं। पैसों और चरण वंदन के दम पर अदना सा कर्मचारी भी यहां साहब का रुतबा हासिल कर लेता है। सियासतदानों के रहमो करम से ऐसा संभव होता है। ऊपर से तुर्रा यह कि सरकार बदल जाए और कर्मचारी का तबादला हो जाए तब भी वह सालों साल उसी पुरानी कुर्सी पर चिपके रहता है जो उसे रिटर्न गिफ्ट के तौर पर मिली होती है। ऐसा ही एक मामला बस्तर संभाग के सुकमा जिले से सामने आया है। जहां का एक मैदानी कर्मचारी पूर्व मंत्री की कृपा से सीधे जिला स्तर का अधिकारी बन गया है। इस साहब का तबादला हुए दो साल बीत चुके हैं, मगर उन्हें आज तक रिलीव नहीं किया गया है। मतलब साफ है पूर्व मंत्री के खौफ से सुकमा जिले के बड़े प्रशासनिक अधिकारी अब तक उबर नहीं पाए हैं या फिर वे भी “लक्ष्मीजी” के सामने नत मस्तक हो गए हैं।
मामला बस्तर संभाग के सुकमा जिले के कोंटा विकासखंड का है। यहां पदस्थ ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी पूर्ववर्ती सरकार के मंत्री की आवभगत में माहिर रहे हैं। पूर्व मंत्री ने रिटर्न गिफ्ट के तौर पर इस कर्मचारी को जिला पंचायत सुकमा में संलग्न कराकर उन्हें सहायक परियोजना अधिकारी की मलाईदार कुर्सी दिलवा दी। इस नए पद पर आने के बाद उन्हें स्थापना शाखा, वेतन शाखा, निर्माण कार्य शाखा की जिम्मेदारी सौंप दी गई। इन सभी शाखाओं में कमीशन का खेल जमकर चलता है। इस कर्मचारी का तबादला राज्य शासन द्वारा कोंटा से कांकेर जनपद के लिए 2022 में किया गया था, मगर आज लगभग चार साल बाद भी उन्हें कार्यमुक्त नहीं किया गया है। ज्ञातव्य हो कि सुकमा जिले में कई कर्मचारी ऐसे हैं जिन पर शासन के आदेशों का कोई असर ही नहीं होता। ऐसे कई कर्मचारी हैं जो लाखों के भ्रष्टाचार को अंजाम देकर सुकमा में वर्षों से जमे बैठे हैं। राज्य शासन द्वारा तबादला किए जाने पर सत्ताधारी दल के स्थानीय नेताओं की मदद से विभागीय मंत्रियों की आवभगत कर तबादला निरस्त करा लेते हैं। वर्षों से उद्योग विभाग सुकमा में पदस्थ एक अधिकारी को पूर्व मंत्री के इशारे पर कोंटा जनपद सीईओ का प्रभार दिया गया था। चुनाव के दौरान शिकायत हुई तो वहां से खदेड़े जाने पर वे अपने काले कारनामों को फाईलों में बंद रखवाने के उद्देश्य से जिला पंचायत में सहायक परियोजना अधिकारी के कुर्सी पर कब्जा जमाने में कामयाब रहे। कोंटा जनपद पंचायत में काले कारनामों की शिकायत प्रदेश संगठन से हुई तो प्रदेश संगठन ने कार्यकर्ता की शिकायतों को प्राथमिकता में लेते हुए उनका तबादला बलरामपुर जिले में कर दिया गया था। तत्कालीन कलेक्टर की मेहरबानी से उन्हें 3 माह तक भारमुक्त नहीं किया गया। अंजाम यह हुआ कि उन्होंने राजधानी की दौड़ लगाकर अपना तबादला आदेश निरस्त करवा लिया। दूसरा मामला जनपद एवं जिला पंचायत से जुड़ा है। कोंटा में एडीओ के पद पर पदस्थ कर्मचारी का तबादला अगस्त 2022 में कांकेर हुआ था। इस कर्मचारी ने जुगाड़ लगा कर जिला पंचायत सुकमा में सहायक परियोजना अधिकारी का पद हथिया लिया। सुकमा जिला पंचायत में शासन के नियमों का वर्षों तक पालन नहीं होता जो कर्मचारी अधिकारी को आवभगत कर खुश कर देता है वह कुर्सी पर वर्षों तक कब्जा जमे रहता है। आलम यह है कि जिला पंचायत सुकमा में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने पर सभी आवेदकों को एक ही जवाब दिया जाता है कि जांच प्रक्रियाधीन है।

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