संजो कर रखें देव बालिफूल की परंपरा को – लखेश्वर बघेल

०  बस्तर की संस्कृति को आगे बढ़ाने का जिम्मा युवाओं पर
०  बस्तर औऱ ओडिशा के दो गांवों के बीच देव बालिफूल का रिश्ता 
जगदलपुर। जनजातीय बहुल बस्तर में मेल मिलाप और सामाजिक सौहार्द बढ़ाने मित्र बनाने की प्रथा सदियों से चली आ रही है। व्यक्ति व्यक्ति से मीत बदता है, बालिफूल बदता है। सबसे आकर्षक जुगलबंदी तब होती है जब पूरे के पूरे दो गांव आपस में मीत बन जाते हैं। यह बालिफूल कहलाता है। जब दो गांव आपस में मीत या बालिफूल बांध लेते हैं गांव के हर सुख-दुख, त्योहार, मेला मड़ई में सामूहिक सहभागिता करते हैं।
बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। आश्चर्य की बात तो यह है कि बस्तर के संधकरमरी गांव के देवी-देवताओं ने सीमा पार ओडिशा के मोतीगांव के देवी-देवताओं से बालिफूल बांध रखा है। इससे पता चलता है कि यह कितनी पौराणिक परंपरा है। यह प्रथा कब से चली आ रही है किसी को नहीं पता, पर हमें इस सांस्कृतिक विरासत को संजो कर रखना है। ये बातें मंगलवार को छत्तीसगढ़ विधानसभा के उपनेता प्रतिपक्ष लखेश्वर बघेल ने अपने गृह जनपद के ग्राम संधकरमरी में देव बालिफूल उत्सव को मुख्य अतिथि के आसंदी से संबोधित करते हुए कहीं। बस्तर के जनजातीय समाज में एक से बढ़कर एक अनूठी सांस्कृतिक परंपराएं हैं जिनका परिपालन सदियों से होता चला आ रहा है। इनमें से एक देव बालिफूल की छटा यहां देखने को मिली। हर साल यह उत्सव मनाया जाता है कभी संधकरमरी के ग्रामीण अपने देवी-देवताओं के साथ मोतीगांव जाते हैं तो दूसरे साल मोतीगांव के ग्रामीण अपने देवी-देवताओं के साथ सीमा पार कर संधकरमरी आ पहुंचते हैं। इन दोनों गांव के बीच दूरी करीब 7 किमी है। बीच मे सरहद भी है, पर यह सरहद कभी बाधा नहीं बनी मेलजोल में। सरहद पार रोटी-बेटी का संबंध है और दोनों ओर भतरा जनजातीय क्षेत्र होने से सांस्कृतिक समानताएं भी हैं ।

इस कार्यक्रम में देवी देवता सहित आने वाले पूरे लोगों का सम्मान पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों के वादन और गाजे बाजे के साथ पैर धुला कर किया जाता है। टीका लगाकर गमछा पहना कर या सिर पर पागा बांधकर किया जाता है। देव मिलन के बाद सामूहिक भोज होता है, दोनों गांव के लोग बैठकर सुख दुख, जंगल बचाने एक दूसरे के गांव के साथ सदैव खड़े रहने का संकल्प लेते हैं। मोतीगांव से प्रमुख रुप से चैतू सिरहा, बुधराम कलार, लैखन पुजारी, तुला सिरहा, भास्कर पुजारी, विद्या पुजारी, राजमन पुजारी, सरपंच नवीना, चित्रकला कलार, लखन भतरा, संध करमरी से पूर्व सरपंच तुलाराम बघेल, दामोदर कश्यप, मेघनाथ नाग, बेनीराम कश्यप, सुंदर सेठिया समेत दोनों गांव के सैकड़ों ग्रामीण इस उत्सव के सहभागी बने।

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