पांच दिवसीय प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव मंगलवार से ओंकारेश्वर मंदिर में 3 से होगा भव्य अनुष्ठान

जगदलपुर। शहर के मैत्री संघ मार्ग स्थित श्री ओंकारेश्वर मंदिर में भव्य प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव मंगलवार से प्रारंभ होगा। इसके पूर्व आज विधिवत वनयाग (वन यज्ञ) संपन्न कराया गया। इस दौरान ग्राम करकापाल स्थित माता शीतला मंदिर के समीप से दुर्लभ सहाड़ा वृक्ष की लकड़ी का पूजन-हवन कर संग्रह किया गया। मंदिर समिति के अनुसार सहाड़ा वृक्ष की इस छेदन लकड़ी से विश्वकर्मा द्वारा इंद्र एवं इंद्र की पत्नी शचि की प्रतिमा का निर्माण किया गया है, जिसे सभी रत्नों के साथ मंदिर के गुंबद में प्राण-प्रतिष्ठा की पूर्व संध्या पर स्थापित किया गया। मान्यता है कि इससे भविष्य में मंदिर पर आकाशीय बिजली गिरने का भय नहीं रहता है। श्री ओंकारेश्वर मंदिर में भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा 3 से 7 फरवरी तक आयोजित की जा रही है। आज सुबह ग्राम करकापाल में विधिवत मंत्रोच्चार एवं धार्मिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना संपन्न हुई। इस अवसर पर मंदिर समिति के अध्यक्ष एवं महापौर संजय पाण्डेय सपत्नीक और वार्डवासी उपस्थित रहे।


मंदिर समिति के सदस्यों ने बताया कि महोत्सव की शुरुआत मंगलवार को दोपहर 2 बजे भव्य कलश यात्रा से होगी। यह यात्रा महादेवघाट से प्रारंभ होकर नगर भ्रमण करती हुई मंदिर परिसर पहुंचेगी। कलश यात्रा में महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सिर पर कलश धारण कर सहभागिता करेंगी। कार्यक्रम के अंतर्गत 4 फरवरी को मंडप प्रवेश एवं मंडल देवता स्थापना, 5 फरवरी को देवता अधिवास, महा-स्नान, नगर परिक्रमा, रत्न गर्भ प्रतिष्ठा एवं शिखर कलश प्रतिष्ठा के अनुष्ठान संपन्न होंगे। मुख्य प्राण-प्रतिष्ठा समारोह 6 फरवरी शुक्रवार को अभिजित मुहूर्त में दोपहर 12:15 बजे से 1:56 बजे के मध्य विधिवत संपन्न कराया जाएगा। इसी दिन देवता गर्भ प्रवेश का अनुष्ठान भी होगा। मंदिर में श्री ओंकारेश्वर महादेव, भगवान श्री गणेश, मां दुर्गा, राम दरबार, भगवान हनुमान एवं माता संतोषी की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। महोत्सव का समापन 7 फरवरी शनिवार को दोपहर 1 बजे से महा-प्रसाद भंडारे के साथ होगा। इस अवसर पर मंदिर समिति के अध्यक्ष एवं महापौर संजय पाण्डेय ने कहा कि ओंकारेश्वर मंदिर का प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह वार्ड की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक पहचान को भी सुदृढ़ करेगा। उन्होंने श्रद्धालुओं से पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होकर आयोजन को सफल बनाने की अपील की। साथ ही बताया कि आयोजन के दौरान स्वच्छता, प्रकाश व्यवस्था एवं अन्य आवश्यक सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाएगा। आज की पूजा में संजय पाण्डे, आचार्य रामराज त्रिपाठी, पंडित चंदन त्रिपाठी, रंगा आचार्य, सुकुमार धर, राजेश महावर, संध्या महावर, रेखा पाण्डेय, सुब्रा दास, किरण सोनी, रजनी पाठक, सुशीला देवी मौजूद रहे।

वैदिक परंपरा है वनयाग
वनयाग एक प्राचीन वैदिक परंपरा है, जिसमें देवकार्य या यज्ञ हेतु वन से संबंधित वस्तुओं जैसे लकड़ी, शिला आदि का चयन किया जाता है। इस प्रक्रिया में पहले स्थल की शुद्धि कर वैदिक आचार्यों, विश्वकर्मा एवं सहयोगियों द्वारा पूजन प्रारंभ किया जाता है। गौरी-गणेश पूजन, कलश स्थापना, रुद्र एवं वनदुर्गा की आराधना के साथ हवन कर ग्राम देवी-देवताओं को संतुष्ट किया जाता है। वृक्ष छेदन से पूर्व क्षमा प्रार्थना कर प्रायश्चित किया जाता है, जिससे यज्ञ एवं मंदिर निर्माण कार्य निर्विघ्न संपन्न हो सके।

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