रायपुर। छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को केवल प्रचार की भूख में भाजपा का राजनैतिक इवेंट करार देते हुए प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि लगभग इसी तरह के कानूनों पर सर्वोच्च न्यायालय ने 12 राज्यों को नोटिस जारी हुआ है, 2006 में रमन सिंह की सरकार में भी इसी तरह का मैसेज देने की नौटंकी किया गया था, इस कानून में भी कुछ नया नहीं है, 2006 के संशोधनों का ही कॉपी पेस्ट है। असलियत यह है कि भाजपा सरकार धर्मांतरण का समुचित समाधान चाहती ही नहीं, नए कानून के नाम पर केवल राजनीति करना चाहती है। विधानसभा में कांग्रेस के विधायकों ने विधेयक को समीक्षा के लिए प्रवर समिति को सौंपने की मांग की, ताकि संवैधानिक समीक्षा हो सके, लेकिन इस सरकार ने विपक्ष की मांग को बिना विचार के खारिज कर दी। सरकार के अधिनायकवादी रवैये के बाद कांग्रेस ने कार्यवाही का बहिष्कार किया।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी का वरिष्ठ प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि डर, लालच या धोखा देकर धर्मांतरण कराना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि पहले से ही कानूनन अपराध भी है। यह सरकार अपनी अक्षमता छुपाने के लिए केवल प्रक्रिया और सजा के प्रावधानों में बदलाव करके अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहती है।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि नए धर्म स्वातंत्र्य कानून संवैधानिक और मौलिक अधिकारों की कसौटी पर खरा उतरेगा इसमें सरकार को ही संशय है। संविधान विशेषज्ञों का मत है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के तहत मिले समानता और निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है, संविधान के अनुच्छेद 25 से लेकर 28 तक धार्मिक स्वंतत्रता के अधिकार वर्णित है, जो मौलिक अधिकारों में शामिल है। उससे इतर कोई भी कानून की संवैधानिक समीक्षा आवश्यक है। केवल सजा के अत्यधिक सख्त प्रावधान और भारी जुर्माना समस्या का हल नहीं है। भाजपा सरकार के दुर्भावना पूर्वक बनाए इस कानून से छत्तीसगढ़ में “घर वापसी“ को वैध धर्मांतरण मानने पर विवाद है, इस एक्ट के कई प्रावधान स्पष्ट तौर पर संविधान के मौलिक अधिकारों का हनन और भेदभावपूर्ण हैं।