0 बस्तर के अंतिम छोर तक अब पहुंचेगी सरकार
0 सांसद कश्यप ने रखी विशेष प्रावधान की मांग
जगदलपुर। बस्तर लोकसभा क्षेत्र के सांसद महेश कश्यप ने देश की सर्वोच्च पंचायत लोकसभा के वर्तमान सत्र में छत्तीसगढ़ के सुदूर वनांचल और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की एक अत्यंत गंभीर एवं संवेदनशील समस्या को प्रमुखता से उठाया है। सदन का ध्यान आकर्षित करते हुए सांसद कश्यप ने बताया कि किस प्रकार बीजापुर और सुकमा जिलों के सीमावर्ती गांवों में जनगणना के सटीक आंकड़े न होने के कारण हजारों ग्रामीण सरकारी योजनाओं के लाभ से पूरी तरह वंचित हैं।
सांसद कश्यप ने सदन को अवगत कराया कि बस्तर संभाग के इन दुर्गम क्षेत्रों में नक्सलवाद की चुनौती, सुरक्षा कारणों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के चलते वर्ष 2001 और 2011 की जनगणना सुचारू रूप से संपन्न नहीं हो पाई थी। इस प्रशासनिक अंतराल का दुष्परिणाम यह हुआ है कि आज भी सरकारी अभिलेखों में इन गांवों की वास्तविक जनसंख्या और सामाजिक आर्थिक स्थिति के आंकड़े सही ढंग से दर्ज नहीं हैं। आधिकारिक डेटा की इस कमी की वजह से शासन की अधिकांश जनकल्याणकारी नीतियां इन गांवों की दहलीज तक नहीं पहुंच पा रही हैं। सांसद कश्यप ने कहा कि सटीक आंकड़ों के अभाव का सीधा नकारात्मक प्रभाव स्थानीय आदिवासी समुदाय की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, स्वच्छ पेयजल और सड़क जैसी बुनियादी ढांचागत सुविधाओं पर पड़ रहा है। जब किसी गांव का अस्तित्व ही कागजों पर स्पष्ट नहीं होता, तो वहां विकास कार्यों के लिए बजट आवंटन और योजनाओं का क्रियान्वयन तकनीकी रूप से बाधित हो जाता है। इसके कारण बस्तर के अंतिम छोर पर बैठा व्यक्ति आज भी विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ महसूस कर रहा है। सांसद महेश कश्यप ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया है कि इन प्रभावित क्षेत्रों की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए यहां एक विशेष सर्वेक्षण आयोजित किया जाए, ताकि आंकड़ों का पुनः सत्यापन कर वास्तविक स्थिति का आकलन हो सके। इसके साथ ही उन्होंने मांग की कि जब तक सर्वेक्षण की यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक इन गांवों के सर्वांगीण विकास के लिए विशेष आर्थिक प्रावधान किए जाएं, ताकि विकास की गति न रुके। सांसद श्री कश्यप ने कहा कि केंद्र सरकार के सकारात्मक हस्तक्षेप और इस दिशा में किए गए त्वरित प्रयासों से बस्तर के इन उपेक्षित सीमावर्ती क्षेत्रों में नई सुबह आएगी। उन्होंने कहा कि उनका लक्ष्य शासन की योजनाओं को उस व्यक्ति तक पहुंचाना है,जो दशकों से भौगोलिक और प्रशासनिक बाधाओं के कारण अपने अधिकारों से वंचित रहा है।