गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के मैनपुर विकासखंड अंतर्गत आदिवासी बहुल राजापड़ाव क्षेत्र में एक बार फिर ग्रामीणों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा। 8 पंचायतों के 30 से अधिक गांवों से करीब 2000 महिला-पुरुषों ने आज नेशनल हाइवे 130-सी को जाम कर दिया। प्रदर्शनकारियों की एकमात्र मांग है कि उदंती-सीता नदी अभयारण्य के कोर जोन में आने वाले 20 से अधिक विद्युत-विहीन गांवों में तत्काल बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
हाइवे जाम होने से सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। ग्रामीणों ने बताया कि यह क्षेत्र पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्र है, जहां पेसा अधिनियम-1996 लागू है। संविधान के अनुच्छेद 244(1) के तहत यहां आदिवासी समुदायों को विशेष संरक्षण प्राप्त है। इसके बावजूद 78 वर्षों बाद भी कई गांव अंधेरे में जी रहे हैं।
प्रदर्शन में शामिल प्रमुख नेता अम्बेडकरवादी समिति के अध्यक्ष पतंग नेताम, जिला पंचायत सदस्य संजय नेताम और लोकेश्वरी नेताम ने बताया कि क्षेत्र की 8 ग्राम पंचायतों में से सिर्फ 3—अड़गड़ी, शोभा और गोना—आंशिक रूप से विद्युतीकृत हैं। शेष भूतबेड़ा, कुचेंगा, कोकड़ी, गरहाडीह और गौरगांव जैसे गांव आज भी बिजली के बिना जीवनयापन करने को मजबूर हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि बिजली अब केवल सुविधा नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं की सुरक्षा, सिंचाई, आजीविका और सूचना तक पहुंच का मूल आधार है। विद्युत का अभाव बच्चों की पढ़ाई, महिलाओं की सुरक्षा और किसानों की सिंचाई क्षमता को सीधे प्रभावित कर रहा है। यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 21 (सम्मानजनक जीवन), 21-क (शिक्षा का अधिकार) तथा अनुच्छेद 38-39 (सामाजिक न्याय) के विपरीत है।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि इन पंचायतों के लिए पहले से ही अंडरग्राउंड विद्युतीकरण की प्रशासनिक स्वीकृति मिल चुकी थी और काम भी शुरू हो चुका था, लेकिन 2023 के बाद बिना किसी स्पष्ट आदेश के कार्य रोक दिया गया। यह सुशासन, विधि के शासन और प्रशासनिक उत्तरदायित्व के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है।
जिला पंचायत सदस्य संजय नेताम ने बताया कि यह एक साल में राजापड़ाव क्षेत्र में नेशनल हाइवे जाम करने का चौथा बड़ा प्रदर्शन है, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है।
प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि वे राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपेंगे और जब तक बिजली आपूर्ति पर ठोस निर्णय नहीं होता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। ग्रामीणों का कहना है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें मनवाने के लिए हर स्तर पर संघर्ष जारी रखेंगे। यह आंदोलन आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और विकास की अनदेखी पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। प्रशासन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है।