रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के पुलिस लाइन परिसर में बड़ी संख्या में पीपीई किटें बरामद होने से हड़कंप मच गया है। परिसर के एक हिस्से में पैकेटबंद पीपीई किटें इधर-उधर फेंकी हुई मिलीं, जबकि कुछ पर जलाने के स्पष्ट निशान दिखाई दिए। एक किट की कीमत करीब 1800 रुपये होने से सरकारी खजाने को लाखों रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये किटें वर्ष 2020 की बताई जा रही हैं—वह दौर जब कोरोना महामारी चरम पर थी और पूरे देश में स्वास्थ्यकर्मियों के लिए पीपीई किटों की भारी किल्लत थी। कई अस्पतालों में डॉक्टर और नर्स बिना पर्याप्त सुरक्षा के मरीजों का इलाज करने को मजबूर थे। ऐसे संकटकालीन संसाधनों का अब लावारिस और क्षतिग्रस्त हालत में मिलना गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
स्थानीय स्तर पर चर्चा जोरों पर है कि अगर ये किटें उस समय उपलब्ध थीं तो इनका उपयोग क्यों नहीं किया गया? क्या यह महज लापरवाही थी या सप्लाई चेन में बड़ी चूक हुई? साथ ही, किटों को जलाने की कोशिश के निशान से यह शक गहरा रहा है कि इन्हें जानबूझकर नष्ट करने का प्रयास किया गया। इसके पीछे कौन जिम्मेदार है और किसके आदेश पर यह हुआ?
यह मामला स्वास्थ्य विभाग, पुलिस और अन्य संबंधित एजेंसियों की कार्यशैली पर बड़ा सवालिया निशान लगा रहा है। अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि ये किटें किस विभाग के स्टॉक की थीं, इन्हें पुलिस लाइन में फेंकने या नष्ट करने का फैसला किसने लिया और इसकी जिम्मेदारी किसकी है।
कोरोना जैसी राष्ट्रीय आपदा के दौरान जरूरी सुरक्षा उपकरणों की इस तरह की बर्बादी ने संसाधन प्रबंधन, पारदर्शिता और जवाबदेही पर फिर से बहस छेड़ दी है। कई संगठनों और नागरिकों ने उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। प्रशासन की ओर से अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक मामले की जांच जल्द शुरू की जा सकती है।