० बुरी आत्माओं से बस्तर की सुरक्षा के लिए किया जाता है तांत्रिक अनुष्ठान
० तांत्रिक अनुष्ठान में दी जाती है बकरों की बलि
(अर्जुन झा)जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा सिर्फ जन आकर्षण का ही केंद्र नहीं है, बल्कि इस दौरान पूरी की जाने वाली रस्में भी अलौकिक होती हैं। इन रस्मों में तांत्रिक पूजा अनुष्ठान भी शामिल है। यह अनुष्ठान बस्तर को बुरी आत्माओं के कहर से बचाने और देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। तांत्रिक अनुष्ठान के दौरान बकरों की बलि भी दी जाती है। यह रस्म निशा जात्रा के दौरान पूरी की जाती है।
रहस्यों और रोमांच से भरे बस्तर दशहरा वस्तुतः देवी आराधना का महापर्व है। यह महापर्व बस्तर संभाग की प्रथम पूज्यनीया माई दंतेश्वरी को समर्पित है। इस महापर्व में बस्तर के सभी देवी देवताओं का आगमन होता है। उनके रहवास की अलग अलग व्यवस्था रहती है। नियमित पूजा अर्चना का दौर चलते रहता है। इस दौरान तरह तरह की प्राचीन परंपराओं और रीति रिवाजों का नियमानुसार पालन भी किया जाता है। इन्हीं रिवाजों में शामिल है तांत्रिक पूजा अनुष्ठान। तांत्रिक पूजा अनुष्ठान निशा जात्रा के दौरान पूरा किया जाता है।यह रस्म बस्तर राजवंश के लोगों द्वारा ही पूरा कराने की परंपरा है। बीती रात निशा जात्रा और तांत्रिक पूजा अनुष्ठान का आयोजन हुआ।देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बस्तर राजवंश के कुलदीपक राजा कमलचंद भंजदेव ने देर रात निशा जात्रा की रस्म पूरी की। इस दौरान माता को प्रसन्न करने के लिए भोग लगाने के साथ बकरों की बलि भी दी गई। बस्तर दशहरा की इस अनूठी रस्म के जरिए बस्तर को बुरी प्रेत आत्माओं से बचाने की प्रार्थना की जाती है। अष्टमी और नवमी तिथि के बीच देर रात को यह रस्म निभाने की परंपरा 600 साल चली आ रही है। इस रस्म के तहत देर रात राजा कमलचंद भंजदेव के साथ बस्तर राज परिवार के प्रमुख सदस्य मां दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी एवं अन्य लोग पैदल चलकर अनुपमा चौक स्थित गुड़ी मंदिर पहुंचे।