
0 विस्थापन का दंश, पुनर्वास न होने से परंपरा और संस्कृति भी खतरे में
0 संकट में सुकमा जिले की दोरला जनजाति के लोग
(अर्जुन झा)जगदलपुर। क्या कोई बांध या बड़ा स्ट्रक्चर किसी जन समुदाय या संस्कृति का अस्तित्व मिटा सकता है?आपको शायद इस बात पर यकीन न हो, लेकिन ऐसा हुआ है। पड़ोसी राज्य में बन रहे एक बांध ने छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग की की दोरला जनजाति के अस्तित्व, उनकी संस्कृति और परंपरा को खतरे में डाल दिया है। यह अविश्वसनीय, मगर सच्ची घटना बस्तर संभाग के सुकमा जिले से सामने आए है। आंध्राप्रदेश और तेलंगाना की सीमाओं से लगे बस्तर संभाग के सुकमा एवं बीजापुर जिलों के दोरनापाल, चिंतलगुफा समेत दर्जनों गांवों में दोरला जनजाति के लोग में सदियों से निवास करते आ रहे हैं। ये लोग तेंदूपत्ता, महुआ, विक्रय और छोटे मोटे व्यापार के जरिए जीविकोपार्जन करते हैं। देखरेख और संरक्षण के अभाव तथा धर्मांतरण के चलते यह जनजाति वैसे भी अल्पसंख्यक स्तर पर पहुंच गई है। रही सही कसर आंध्रप्रदेश में बन रहे पोलावरम बांध ने पूरी कर दी है। इस बांध के डूबान क्षेत्र में सुकमा जिले में निवासरत दोरला जनजाति के लोगों के गांव आ गए हैं। जो जंगल और जमीन उनके जीवन के आधार रहे हैं, वह उनसे छीन ली गई है। उनके पूजा स्थल, मकान, आस्था, परंपरा और संस्कृति के केंद्र भी पोलावरम बांध की भेंट चढ़ गए हैं। उन्हें उनकी जमीन से विस्थापित तो कर दिया गया है,उनके पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। आधे अधूरे पुनर्वास ने उनकी पूरी दुनिया उजाड़ कर रख दी है। उन्हें पर्याप्त मुआवजा भी नहीं दिया गया है। विस्थापन के बाद नए आशियाने की तलाश में दोरला आदिवासी दर दर भटकते रहे और आज भी भटक रहे हैं। कौन कहां चला गया, इसका कोई अता पता नहीं है। आज इनके संरक्षण की सख्त जरूरत है और सरकार को इस दिशा में प्रभावी कदम उठाना होगा।
कांग्रेस नेता दुर्गेश राय ने की चिंता
दोरला जनजाति की विलुप्ति को लेकर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव एवं सुकमा जिले के वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने गहरी चिंता जताई है। श्री राय ने इस मुद्दे को राजयसभा सांसद फूलोदेवी नेताम के समक्ष रखा है। आज दिल्ली में राज्यसभा सांसद फूलोदेवी नेताम से छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी सचिव दुर्गेश राय ने मुलाकात की और उन्हें दोरला समाज की पीड़ा और विस्थापन की विस्तार से जानकारी दी। दुर्गेश राय ने फूलोदेवी नेताम को बताया कि पारंपरिक और पुरातन दोरला जनजाति अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। पोलावरम बांध ने उनका सब कुछ लूट लिया है। उनके पुनर्वास की योजना अधूरी है, प्रभावितों को समुचित मुआवजा भी नहीं मिल रहा है। शिक्षा, रोजगार और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव ये लोग झेल रहे हैं। जनजातीय संस्कृति, भाषा और परंपरा पर भी खतरा मंडरा रहा है। सांसद फूलोदेवी नेताम ने मामले को राज्यसभा में उठाने का आश्वासन देते हुए कहा कि केंद्र सरकार से जवाब मांगा जाएगा और दोरला जनजाति को बचाने के लिए ठोस कार्रवाई की मांग की जाएगी। अब दोरला समाज की आवाज को मिलेगा अब राष्ट्रीय मंच।