वर्षों से पदस्थ अधिकारी को सुकमा के प्रति ऐसा मोह क्यों? शासन के आदेशों को दिखाया ठेंगा

0  तबादले के 60 दिन बाद भी सहायक संचालक को नहीं किया गया भारमुक्त 
0 पूर्व मंत्री लखमा के करीबी अफसर का रुतबा कायम 
(अर्जुन झा)जगदलपुर। बस्तर के नक्सल प्रभावित जिलों में अपनी पदास्थापना को अधिकारी कर्मचारी सजा के रूप में देखते हैं और यहां से जितनी जल्दी हो छुटकारा पाना चाहते हैं, मगर कुछ अफसर ऐसे भी हैं, जिनसे धुर नक्सल प्रभावित सुकमा जिले का मोह छूट नहीं रहा है। पूर्व मंत्री कवासी लखमा तो अभी कथित शराब घोटाला मामले में अभी जेल में हैं मगर उनके खासम खास माने जाने इस अफसर का रुतबा अब भी सुकमा जिले में बरकरार है। तबादला आदेश जारी होने के दो माह बाद भी ये साहब यहां अपने पद पर बने हुए हैं। उन्हें रिलीव नहीं किया जा रहा है। इसके पीछे न जाने कौन सी अदृश्य शक्ति काम कर रही है कि उसके सामने बड़े अफसर भी नत मस्तक हो गए हैं।
नक्सल प्रभावित सुकमा जिले में अधिकारी- कर्मचारी आना नहीं चाहते। उन्हें सजा के तौर पर यहां भेजा जाता है। यहां आने के बाद सजा उनके लिये वरदान साबित हो जाती है। यहां के चारागाह में वह आकर अधिकारी खुद इस कदर हरे-भरे हो जाते हैं कि यहां से जाना ही नहीं चाहते। ऐसा ही कुछ मामला सुकमा के उद्योग एवं पंचायत विभाग में देखने को मिल रहा है। यहां पदस्थ सहायक संचालक को तत्काल भारमुक्त कर बलरामपुर में पदस्थ करने का आदेश जारी हुए करीब 60 दिन बीतने को हैं, मगर उन्हें अब तक भारमुक्त नहीं किा गया है। यह शासन के आदेशों की सरासर अवहेलना है। पंचायत विभाग का एक कर्मचारी जिसका तबादला कांकेर लिए दो वर्ष पूर्व किया गया था वह भी अंगद की तरह सुकमा जिले में ही जमे हुए हैं। ज्ञातव्य हो कि पूर्व मंत्री के करीबी उद्योग विभाग के अधिकारी को संगठन की शिकायत पर सरकार ने बस्तर संभाग से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। आठ साल से सुकमा जिले में पदस्थ सहायक संचालक भी अंगद के पैर की तरह यहीं जमे हुए हैं। कांग्रेस के शासनकाल में पंचायत विभाग में विभिन्न पदों पर पदस्त रहते हुए इस अधिकारी ने पंचायत के विकास कार्यों में जमकर गफलत की है। केवल कागजी खानापूर्ति कर रीपा, अमृत सरोवर सहित अन्य योजनाओं में लाखों करोड़ों का बंदरबांट करने का आरोप भाजपा के स्थानीय नेता लगाते हुए प्रदेश स्तर के संगठन के नेताओं से शिकायत कर उन्हें संभाग से बाहर करने की मांग कर चुके हैं। यह भी आरोप लगाया गया था था कि ये अफसर पूर्व आबकारी मंत्री के काफी करीबी हैं।

शासन बनाम प्रशासन
जानकारी के अनुसार स्थानीय कार्यकर्ताओं की शिकायत पर प्रदेश संगठन के कहने पर विभागीय मंत्री निर्देश पर वाणिज्य एवं उद्योग विभाग के उप सचिव उमेश कुमार पटेल द्वारा 19 मई 2025 को आदेश करते हुए सुकमा में पदस्थ उद्योग विभाग के सहायक संचालक को यहां से भारमुक्त करते हुए बलरामपुर तबादला किया था। उक्त आदेश का लगभग 50 दिन बाद भी पालन नहीं हो सका है। संगठन के फरमान पर सरकार ने एक्शन तो लिया लेकिन जिला प्रशासन ने सरकार के आदेशों को ठुकराते हुए उक्त अधिकारी को भारमुक्त करने से इंकार कर दिया। जिसको लेकर चर्चा है कि पूर्व मंत्री के करीबी अधिकारी पर जिले के अफसर भी मेहरबान बने हुए हैं।

एक जिले में दो नियम
पूर्व सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार को उजागर कर ऐसे कर्मचारियों को बेनकाब करने वाला जिला पंचायत में पदस्थ परियोजना अधिकारी का तबादला हुआ तो उसे सप्ताह भर में भारमुक्त कर दिया गया। वहीं पूर्व सरकार के मंत्री के करीबी अधिकारी को रिलीव करने में जिला प्रशासन रिलीवर न आने का हवाला देकर मेहरबान बना हुआ है। एक जिले में दोहरा नियम चलाना कई शंकाओं को जन्म देता है। भाजपा में सत्ता और संगठन में संगठन को बड़ा माना जाता है। संगठन से ही सरकार बनती है। लेकिन सुकमा में संगठन और सरकार पर अफसर हावी हैं। चर्चा का विषय है कि संगठन के आदेशों का सुकमा जिले में खास असर नहीं पड़ता। यहां तो आज भी अधिकारी कर्मचारी पूर्व सरकार के मंत्री के करीबियों के फरमानों का महत्व दिया जा रहा है।

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