जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो हिंसा और बंदूक के साए से निकलकर प्रेम, जीवन और उम्मीद की ओर बढ़ने की मिसाल बन गई है। यह कहानी है पूर्व नक्सली दंपती अमित बारसा और अरुणा की, जिन्होंने संगठन की कठोर जंजीरों को तोड़कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया है।
कभी नक्सली संगठन में पोलित ब्यूरो सदस्य वेणुगोपाल के सुरक्षा गार्ड रह चुके अमित बारसा पर डेढ़ करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। अरुणा संगठन की सप्लाई यूनिट में कार्यरत थी। दोनों ने बुधवार को आत्मसमर्पण कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया।
जंगल में जन्मा प्रेम, बंदूक के बीच इशारों की भाषा
संगठन के भीतर सख्त अनुशासन, सीमित संवाद और तमाम बंदिशों के बावजूद अमित को अरुणा से प्रेम हो गया। वह दो महीने तक अरुणा के जवाब का इंतजार करता रहा। जब अरुणा ने हामी भरी, तब दोनों के बीच जंगलों में एक खामोश लेकिन मजबूत रिश्ता पनपने लगा। हालांकि, संगठन के नियमों के तहत शादी से पहले दोनों को नसबंदी करवानी पड़ी—जो उनके लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गहरा समझौता था।
नई जिंदगी की शुरुआत, खुलकर जीने की तमन्ना
आत्मसमर्पण के बाद अमित का कहना है, अब सिर्फ जीना है, खुलकर… हथियार के साये में नहीं। मैं नसबंदी की प्रक्रिया को रिवर्स कराना चाहता हूं। हमें बच्चे चाहिए। एक सामान्य जीवन चाहिए, जिसमें हम परिवार के साथ खुशी से रह सकें।
अरुणा भी भावुक स्वर में कहती है कि संगठन में रहते हुए उन्होंने सिर्फ आज्ञा मानी, कभी खुलकर जीवन को महसूस नहीं किया। अब वे एक नई शुरुआत करना चाहते हैं—एक ऐसी जिंदगी जिसमें डर, हिंसा और बंदूक की कोई जगह न हो। अमित और अरुणा के आत्मसमर्पण के साथ ही प्रशासन ने उन्हें सुरक्षा और पुनर्वास नीति के तहत हरसंभव सहायता देने का भरोसा दिलाया है। अधिकारियों के अनुसार, यह सिर्फ एक आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि उन सैकड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो अब भी हिंसा की राह पर हैं।